Sunday, October 16, 2011

प्रजातंत्र की पीड़ा




बिहार की जदयू विधायक जगमातो देवी के निधन से सीवान जिले के दरौंदा विधानसभा क्षेत्र की सीट खाली हो गयी है। इस जगह के लिए चुनाव होना है। प्रजातंत्र की पुकार है कि उस क्षेत्र में सर्वाधिक योग्य जनसेवक की खोज हो और उन्हें पार्टी टिकट देकर जिताये। लेकिन राजतंत्र की राय अलग है। उसमेंं राजा के बेटे को ही राजगद्दी मिलने का विधान है। स्वाधीन भारत ने प्रजातांत्रिक प्रणाली  अपनायी, लेकिन क्रांतिकारी शिक्षा के अभाव में राजतंत्रीय पुराना संस्कार जारी है। इसके दो प्रमाण मुझे तुरत मिले हैं। एक टीवी चैनल पर दिये गये बाइट में स्वर्गीया जगमातो देवी के पुत्र श्री अजय सिंह ने मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को राजा कहकर संबोधित किया और स्टूडियो में बैठे एक ज्योतिषाचार्य ने इससे भी बढ़कर बताया कि राजा में तो ईश्वर का अंश होता है। मुझे तुलसीदास याद आ गये ! उन्होंने जीवमात्र में ईश्वर का अंश देखा था - ‘ईस्वर अंस जीब अबिनासी’। लेकिन पंडित, पुरोहित, ज्योतिषाचार्य आदि की आँखों पर राजभक्ति का ऐसा चश्मा चढ़ा रहता है कि उन्हें केवल राजा में ईश्वर का अंश दिखायी पड़ता है। हम देख रहे हैं कि भारतीय प्रजातंत्र की गंगा में राजतंत्र की यमुना भी मिली हुई है। नदियाँ आपस मंे मिले तो संगम तीर्थ बन जाता है, लेकिन दो विपरीत तंत्र आपस में मिले तो राजनीतिक रोग पैदा होता है। प्रजातंत्र के भीतर राजतंत्र के कीटाणु घुसे हुए हैं। फलतः प्रजातंत्र बीमार चल रहा है। बदन दर्द एवं बुखार से छटपटा रहा है और इलाज के लिए भारत के क्रांतिकारी सपूतों को पुकार रहा है। छोटी-सी उमर में ही उसे यह रोग लग गया है, लोग कहते हैं नहीं बचेगा।
प्रजातंत्र कह रहा है कि मेरी रक्षा करनी है तो जनता के बीच से भारत माता की सुयोग्य संतानों को चुनो, लेकिन राजतंत्र कहता है, राजा का पुत्र ही सर्वाधिक योग्य उत्तराधिकारी हो सकता है। राजतंत्र की जीत हुई है। राजा ने तय किया है कि स्व. जगमातो देवी के पुत्र अजय सिंह ही विधायक बनेंगे। लेकिन राजा की राह में एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गयी ! राजकुमार श्री अजय सिंह आपराधिक छवि के हैं। सुना है कि उन पर 49 केस चल रहे हैं। वैसे तो सामान्यतः कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि पार्टी एक से बढ़कर एक बाहुबलियों को अपने पेट में पचाये हुए है, उनमें एक और सही ! लेकिन लगता है कि अड़चनें कुछ ज्यादा ही कठिन रही होंगी। अजय सिंह को टिकट देना भारी दुविधा में डालने वाला रहा होगा। करीब करीब असंभव ! अब क्या हो ? राजतंत्र की रक्षा कैसे हो ? प्रदेश के राजा बड़े सूझ बूझ वाले व्यक्ति हैं। चुटकी बजाते ही हल निकालनेवाले। उनका दिमाग कौंध गया ! क्यों नहीं राजपुत्र  का आनन फानन विवाह रचाकर उनकी पत्नी का राज्याभिषेक किया जाय! राजदरबार में राजा की इस सूक्ष्म बुद्धि की जयजयकार हुई ! रास्ता निकल आया। हर्ष छा गया। लेकिन यह क्या ? राह में फिर काँटें आ गए ! पितृपक्ष चल रहा है, इसमें तो विवाह वर्जित है ! इस माह में लोग पितरों का तर्पण करते हैं, कुछ लोग तो दाढ़ी बाल भी नहीं बनाते। अब क्या हेागा ? राजा के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कान दौड़ गयी- ‘मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए।’ सभी दरबारी बुद्धिमान राजा की मुस्कान की तरफ मुखातिब हुए और कयास लगाने लगे कि इस मुस्कान के पीछे जरूर कोई समाधान छिपा होगा ! इतने में राजाज्ञा हुई- राजपुरोहित को दरबार में फौरन हाजिर करो।
राजपुरोहित महामहोपाध्याय ज्योतिषाचार्य पंडित चतुरानन जी महाराज हाजिर हुए। उनके सामने समस्या रखी गयी। पितृ पक्ष में विवाह मुहूर्त निकालना है। पंडितजी, उचित पुरस्कार मिलेगा। पुरोहित ने कहा- प्रभु, इसमें क्या मुश्किल है, इसी पितृपक्ष में तो जिउतिया जैसा पावन पर्व माताएँ मनाती हैं। इसी पितृपक्ष में विश्वकर्मा पूजा धूमधाम से होती है। प्रजा खुशी में लाउडस्पीकर बजाती है, नाचती, गाती है, फिर विवाहोत्सव क्यों नहीं हो सकता! इसमें कोई अड़चन नहंीं है, अन्नदाता ! आवश्यकता आविष्कार की जननी है। पंडितजी ने रास्ता निकाल दिया ! पितृपक्ष में विवाह शुभ है ! लगन महूरत झूठ सब।.... देश, काल, पात्र और जरूरत के अनुसार पितृपक्ष के नियम को शिथिल करते हुए शहनाई बजाने का आदेश निर्गत हुआ ! राजा के इस निर्णय को शिरोधार्य करते हुए राजकुमार ने सहर्ष घोषणा की- ‘आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी, यही हुई  है राय जवाहरलाल की।’ ईश्वर अंश होने के कारण राजा निर्दोष होते हैं ! वे कोई भी निर्णय ले सकते हैं ! तुलसीदास ने भी कहा- समरथ को नहिं दोष गुसाईं ! राजसभा में राजपुरोहित की भी जयकार हुई।
अब एक ही काम बच गया- सौभाग्यशालिनी, शुभाकांक्षिणी, सुलक्षणा सुकन्या की सर्च ! उस कन्या में दो गुण अनिवार्यतः होने चाहिए। एक तो उनमें राजपाट चलाने की क्षमता हो, दूसरे वह पत्नी धर्म का भी निर्वाह सफलतापूर्वक कर सके। सुनते हैं, इस पद के लिए सोलह कन्याएँ खोजी गयीं। उनका इंटरव्यू हुआ। कविता सिंह नामक एक धन्या कन्या इंटरव्यू बोर्ड के द्वारा सेलेक्ट की गयी। श्री अजय सिंह ने अपने पितरों का आह्वान किया। वे सभी आत्माएँ सूक्ष्म शरीर धारण कर विवाह समारोह में उपस्थित हुईं। उनकी उपस्थिति में मंगलगान और आन बान शान के साथ शादी संपन्न हुई।
इस मांगलिक वेला में प्रजा को संबोधित करते हुए राजपुत्र ने कहा- प्यारी प्रजा ! शोक की घड़ी में शुभ कार्य के लिए मुझे क्षमा करना। सेवा के लिए तत्पर मैं तुम्हारे हित में कुछ भी कर सकता हूँ। अन्य विधायक तो अपने क्षेत्र की सेवा में केवल पसीना बहाते हैं, लेकिन हमारे परिवार ने तुम्हारे लिए खून बहाया है। तुम्हारी सेवा करते हुए हमारे परिवार के तीन सदस्य शहीद हुए हैं। इससे अधिक कुर्बानी और क्या हो सकती है ! इसलिए इस क्षेत्र की सेवा करने का जन्मसिद्ध अधिकार केवल मेरा है। अपने रक्त से सिंचे हुए दरौंदा को किसी दरिंदा के अधीन जाते हुए नहीं देख सकता। यह कभी मत सोचना कि मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ। पत्नी तो पति की छाया होती है। इसके माध्यम से मैं ही तुम पर शासन करूँगा। ‘शासन’ शब्द पर चैंको मत। सेवा एक सैद्धांतिक शब्द है, शासन उसका वास्तविक रूप। सेवा प्रजातंत्र की आत्मा है और शासन राजतंत्र की। इसलिए सैद्धांतिक शब्द के लफड़े में मत रहो, वास्तविक और व्यावहारिक अर्थ गहो !

25.09.11

Wednesday, October 12, 2011

सामाजिक प्रेम बनाम प्राकृतिक प्रेम





मुसाफिर भाई के प्रति आभार प्रकट करता हूँ कि उन्होंने ठंडे दिमाग से मेरा लेख ‘प्रेम न जानै जात’ पढ़ा। वरना मेरा नाम सुनते ही कई लोगों के दिमाग गरम हो जाते हैं और आलेख पढ़ते हुए इतने उबल जाते हैं कि उनकी बुद्धि भाप बनकर उड़ जाती है। उस बुद्धिहीन अवस्था में वे ऐसी टिप्पणियाँ कर जाते हैं, जो उनका ही उपहास उड़ाती हैं। लेकिन सिर्फ ठंडा दिमाग काफी नहीं है। चित्त का शांत होना जरूरी है। किसी की बातों को ठीक-ठीक समझना एक साधना है; क्योंकि पढ़ते वक्त बिलकुल तटस्थ हो जाना पड़ता है। अपने पूर्व अर्जित ज्ञान की छाया से उस वक्त बाहर हो जाना पड़ता है। खासकर वहाँ जहाँ ऐसी बात कही जा रही हो, जिससे हम पहले से उतने परिचित नहीं होते। 
मुसाफिर भाई के अनुसार मेरे लेख की मूल भावना है - ‘वैवाहिक संबंध का आधार आपस का नैसर्गिक@ प्राकृतिक प्यार होना चाहिए।’ उनके इसके वाक्य के अनुसार मेरे कथन की मूल भावना यह है कि प्राकृतिक प्रेम आधार है और विवाह आधेय। प्राकृतिक प्रेम नींव है और विवाह इमारत। मैं सोचता हूँ कि क्या मेरे लेख की यही मूल भावना है ? क्या मैंने ऐसा लिखा है ? नहीं, मेरा ऐसा लिखना नहीं है। मेरा कहना है कि प्राकृतिक प्रेम नींव है और इमारत भी। प्राकृतिक प्रेम बीज भी है और फूल भी। प्राकृतिक प्रेम बीज से फूल तक की यात्रा है। वह विवाह का साधन नहीं है। वह साधन भी है और साध्य भी। वह मंजिल भी है और मार्ग भी। विवाह उसकी मंजिल नहीं, किसी सुविधा के ख्याल से बीच में विवाह आ जाय तो अलग बात है। यह बात शुरू में ही स्पष्ट हो जानी चाहिए कि सामाजिक प्रेम और प्राकृतिक प्रेम के बीच विभाजक रेखा विवाह नहीं है।
उनकी टिप्पणी से ऐसा प्रतीत होता है कि सामाजिक प्रेम और प्राकृतिक प्रेम के भेद को लेकर उनके समक्ष एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। उन्होंने लिखा है- ‘सामाजिक प्रेम और प्राकृतिक प्रेम जैसा कोई विभेदक वर्ग अस्तित्ववान नहीं हो सकता। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज है तभी प्रेम है।’
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इससे कौन इंकार करेगा भला ? लेकिन कोई अगर इसका अर्थ यह समझे कि मनुष्य समाज का गुलाम प्राणी है, तो इस अर्थ में मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहना घातक है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, लेकिन समाज का दास नहीं है। मनुष्य सामाजिक प्राणी इस अर्थ में है कि व्यक्तित्व के विकास के लिए, अनेक जरूरतों की पूर्ति के लिए समाज अनिवार्य है। लेकिन समाज ठीक इसके उलट काम करना शुरू कर दे तो उस समाज को बदलने की जरूरत है। पुराने जर्जर समाज को विदा करने और नये प्राणवान समाज को अस्तित्ववान करने की जरूरत है। जो समाज व्यक्ति के स्वतंत्र विकास में सहायक नहीं, वह कुरूप है। जो समाज व्यक्ति के अलग अलग व्यक्तित्व को खिलने न दे, उसे एक खास सांचे में ढाले, वह जीवंत नहीं। 
समाज में ही बुद्ध हुए, कबीर हुए, मीरा हुईं। क्या इन लोगों का प्रेम वही है जो समाज में चलता है ? इनका प्रेम विरल है, लेकिन समाज के हित में है, उसके लिए प्रेरक है, मशाल है, आदर्श है। समाज में प्रचलित प्रेम का जो रूप है, वह उसे गर्त में ले जा रहा है। समाज सुंदर बनेगा तब जब वह प्रेम के प्राकृतिक रूप को समझ कर उसे निखारेगा। प्राकृतिक प्रेम से मेरा तात्पर्य वह प्रेम जो प्रकृति के अनुकूल हो। जो प्रेम प्रकृति के अनुकूल न होकर जड़ मान्यताओं का शिकार होकर भटक गया है , उसी को मैंने सामाजिक प्रेम कहा है। इसे कुरूप, विकृत, रुग्ण, असहज, अस्वाभाविक, कृत्रिम, कपटपूर्ण आदि नामों से भी पुकारा जा सकता था। दोनों की तुलना इन शीर्षकों से की जा सकती थी - कुरूप प्रेम और सुंदर प्रेम, रुग्ण प्रेम और स्वस्थ प्रेम, कृत्रिम प्रेम और प्राकृतिक प्रेम, अस्वाभाविक प्रेम और स्वाभाविक प्रेम, पाखंडपूर्ण प्रेम और सहज प्रेम आदि। लेकिन ऐसा न कर मैंने जान बूझकर दोनों प्रकारों को क्रमशः सामाजिक प्रेम और प्राकृतिक प्रेम नाम दिया है। मुख्य कारण यह है कि सामाजिक प्रेम नैसर्गिकता से दूर वर्जनाओं की बन्द कोठरी मंे दम तोड़ रहा है। प्राकृतिक प्रेम को स्वाभाविक प्रेम, सहज प्रेम, नैसर्गिक प्रेम, स्वच्छंद प्रेम आदि कुछ भी कहा जा सकता है। सामाजिक प्रेम और प्राकृतिक प्रेम जीने की दो भिन्न शैलियाँ हैं, दो भिन्न जीवन दृष्टियाँ हैं। सामाजिक रीति से किये गये विवाह के भीतर भी प्राकृतिक प्रेम हो सकता है और इससे अलग प्रेम विवाह भी सामाजिक प्रेम में तब्दील हो सकता है। प्रेम विवाह करने वाला व्यक्ति भी अगर जाति, संप्रदाय आदि संकीर्णताओं से मानसिक तौर पर जुड़ा है तो वह सामाजिक प्रेम के अंतर्गत ही आएगा। जब तक यह भाव मन में न आए कि हम सब एक ही वृक्ष की शाखाएँ हैं, तब तक प्रेम प्राकृतिक नहीं हो सकता। इन दोनों प्रकार के प्रेम को ठीक ठीक समझने के लिए दोनों के बीच जो मूलभूत अंतर हंै, उन पर नजर डालना जरूरी है। कुछ मुख्य भेदों को मैं रखना चाहूँगा। 


1. सामाजिक प्रेम जाति के दायरे में होता है, जबकि प्राकृतिक प्रेम किसी भी जाति में हो सकता है। यहाँ इस बात को ख्याल में रखना जरूरी है कि प्राकृतिक प्रेम का मतलब हमेशा अंतरजातीय प्रेम या विवाह नहीं होता, क्योंकि वह अपनी जाति में भी हो सकता है और अपनी जाति के बाहर भी। मुख्य बात यह है कि उसे समाज निर्मित कृत्रिम जाति से कोई मतलब नहीं रहता।

2. सामाजिक प्रेम का आधार धर्म या संप्रदाय है, प्राकृतिक प्रेम दो संप्रदायों के बीच भी हो सकता है। वह अंतरपं्रातीय, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय कुछ भी हो सकता है।

3. सामाजिक प्रेम में लड़का-लड़की की उम्र करीब करीब बराबर होती है, इसमें भी इस बात का ख्याल रखा जाता है कि लड़की चार पाँच वर्ष छोटी होनी चाहिए, ताकि मरने से पहले बूढ़े की सेवा के लिए बुढ़िया स्वस्थ और मजबूत रहे ! प्राकृतिक प्रेम में उम्र की कोई बंदिश नहीं होती। स्त्री पुरुष में कोेई भी छोटा बडा हो सकता है और वह फासला कुछ भी हो सकता है।

4. सामाजिक प्रेम में लड़का-लड़की का मानसिक और दिली धरातल पर मेल न कराकर, बाहरी तत्वों का मेल कराया जाता है, जैसे- कंुडली, खानदान, हैसियत इत्यादि। प्राकृतिक प्रेम हृदय का मिलन है। इसीलिए सामाजिक प्रेम में शहनाई बाहर बजती है, जबकि प्राकृतिक प्रेम में दिल के अंदर।

5. सामाजिक प्रेम एक प्रकार का व्यापार है। दहेज की लेन देन, भाव मोल, उसके लिए मुँह फुल्ला फुल्ली, गरमा गरमी, उससे उत्पन्न संबंधों में कटुता और ऊपर से विनम्रता का दिखावा इसके लक्षण हैं। जिनके घरों में बेटियों की संख्या ज्यादा है , वे भगवान से यही प्रार्थना करते हैं- ‘हरहु नाथ मम संकट भारी।’ दहेज का प्रेत अंत अंत तक पीछा करता है। कभी-कभी घरेलू हिंसा का रूप लेते हुए अंत में लड़की की हत्या या आत्महत्या में तब्दील हो जाता है। जहाँ इस तरह की अतिवादी घटनायें नहीं भी घटती हंै वहाँ भी मनुष्य की संवेदना इतनी भोथरी हो चुकी होती है कि यह पशुुवत खरीद बिक्री उन्हें अखरती नहीं। प्राकृतिक प्रेम में इस तरह की बातें कल्पना से परे है।

6. सामाजिक प्रेम एक आडंबर बनकर रह गया है। बारात की हुड़दंग, पटाखों के द्वारा ध्वनि एवं वायु प्रदूषण, असांस्कृतिक नाच गान, आग्नेयास्त्रों का प्रदर्शन, दुर्घटना आदि विवाह के भूषण हैं। शादी में तथाकथित बड़े लोगों की जुटान, गाड़ियों की लंबी कतारें, उनके आन बान और शान की द्योतक मानी जाती हैं। इस आडंबर की होड़ में गरीब को भी जबरन शामिल होना ही पड़ता है और इसी में वे बिक जाते हैं। कोई ऐसा न करे तो उसे लोक निंदा का शिकार होना पड़ता है। यह अमानवीय परंपरा समाज को न केवल मान्य है बल्कि आदर्श रूप में प्रतिष्ठित भी है !

7. सामाजिक प्रेम में बालिग लड़के-लड़िकयाँ भी अयोग्य मानी जाती हैं और वे अपने साथी के चुनाव में स्वतंत्र नहीं हैं। इसलिए उनकी जोड़ी उनके माता पिता और परिवार के लोग लगाते हैं। दोनों पक्षों में झूठ सांच बोलकर बरतुहारी तय की जाती है ! इसमें लड़का-लड़की के रूप, गुण, कमाई वगैरह बढा़ चढा़ कर बताया जाता है ! ऐब छिपाये जाते हैं जो आगे प्रकट होने पर संबंधों में कलह उत्पन्न करते हैं !

8. विवाह मंडप पर कन्या के भरण पोषण एवं जन्म जन्मांतर तक प्रेम निबाहने की जो प्रतिज्ञा करवायी जाती है, वह अपने आप में हास्यास्पद है; क्योंकि जो प्रेम अभी पैदा ही नहीं हुआ है भविष्य में होना है, उसके निर्वाह की प्रतिज्ञा कैसे की जा सकती है ? दूसरी समझने योग्य बात यह है कि क्या प्रेम को प्रतिज्ञा लेने की जरूरत पड़ती है ? प्रतिज्ञा तो प्रेम के अभाव की पूर्ति है। प्रतिज्ञा प्रेम का उपहास है ! इसीलिए प्राकृतिक प्रेम में प्रतिज्ञा का कोई स्थान नहीं है। क्या किसी ने कभी देखा-सुना है माँ को अपने नवजात शिशु के लिए प्रतिज्ञा करते हुए कि हे पुत्र ! मैं अग्नि को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम्हारा लालन पालन बड़े प्यार से करूँगी ?

9. सामाजिक प्रेम में लड़का-लड़की अयोग्य और अक्षम माने जाते हंै, इसलिए उनके प्रेम के संचालन की बागडोर कई लोगों के हाथों में होती है। लड़की अपनी माता, पिता, भाई, बहन, भौजाई से मार्गदर्शन लेती है कि पति और ससुराल के अन्य लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाय और लड़का अपने मां बाप आदि से। इस क्रम में अक्सर पति पत्नी के बीच संबध बनने के बजाय और बिगड़ जाता है। सास पतोहू , ननद भौजाई का झगड़ा भी शुरू हो जाता है। लेकिन प्राकृतिक प्रेम स्वविवेक और आपसी समझ से संचालित होता है। इसलिए बाहरी हस्तक्षेप से सामाजिक प्रेम में जो गड़बड़ियाँ पैदा होती हैं, वे यहाँ नहीं हो पातीं।

10. सामाजिक प्रेम में विवाह पहले होता है, प्रेम बाद में। बाद में भी प्रेम होगा या नहीं इसकी क्या गारंटी है!   प्राकृतिक प्रेम में प्रेम पहले होता है, बाद में विवाह हो भी सकता है और नहीं भी। इस तरह सामाजिक प्रेम विवाह प्रधान होता है और प्राकृतिक प्रेम प्रेम प्रधान। 

11. सामाजिक प्रेम का आदर्श है उसका टिकाऊपन। जो प्रेम टिकता है उसे सफल माना जाता है। उसकी बड़ी सराहना होती है। टूटे हुए प्रेम की निंदा होती है। इसलिए इसमें प्रेम के टिकने पर सर्वाधिक जोर होता है, जबकि प्राकृतिक प्रेम क्षणिक उन्मेष है। वह क्षण फैल भी सकता है, पूरे जीवन तक चल सकता है और दूसरे क्षण विलीन भी हो जा सकता है। प्राकृतिक प्रेम का जोर उसके टिकाऊपन पर नहीं होता, उसकी गुणवत्ता पर, उसके आनंद की सघनता पर होता है। वह जानता है कि प्रेम की वर्षा ऊपर से हुई है, कब बंद हो जायेगी, नहीं मालूम। लेकिन जितनी देर तक प्रेम की झमाझम बारिश होती है उतने पल ही वर्षों के सामाजिक प्रेम पर भारी पड़ जाते हंै। सामाजिक प्रेम पतला होता है, प्राकृतिक प्रेम में घनत्व होता है।

12. सामाजिक प्रेम में जिम्मेदारी का निर्वहन बहुत बडे क्रेडिट का काम माना जाता है। जिम्मेदारी के निर्वहन में ही इस पर प्रेम की इतिश्री हो जाती है। प्राकृतिक प्रेम में जिम्मेदारी का निर्वहन बिना प्रयास के आनंद से अपने आप हो जाता है। जिम्मेदारी का पालन आनंद के पीछे छाया की तरह चलता है। एक में जिम्मेदारी का पालन सायास किया जाता है, कभी कभी अनिच्छापूर्वक भी जबकि दूसरे में अनायास हो जाता है, आनंदपूर्वक।

13. सामाजिक प्रेम पुरुष प्रधान होता है, स्त्री गौण होती है। परिवार में वह दोयम दर्जे की नागरिक होती है। वह बोझ मानी जाती है और अक्सर भू्रण में ही उसको मार भी दिया जाता है। वहाँ पुरुष स्वतंत्र और स्त्रियाँ अपेक्षाकृत परतंत्र होती हैं। प्राकृतिक प्रेम में स्त्री पुरुष दोनों के व्यक्तित्व स्वतंत्र होते हैं। वह दो स्वतंत्र सत्ताओं का मिलन है। स्त्रियों को व्यक्तित्व तो यही प्रेम देता है। जिस परिवार में प्रेमी प्रेमिका अथवा पति पत्नी बराबर हैसियत से रहेंगे, निश्चय ही वहाँ बच्चों के लालन पालन और शिक्षा दीक्षा में बराबरी का ध्यान रखा जाएगा। बेटी को कभी भी शिक्षा के किसी भी अवसर से वंचित नहीं किया जाएगा।

14. सामाजिक प्रेम के केन्द्र में वर्जना होती है, इसलिए उसकी प्रतिक्रिया में उच्छृंखलता पैदा होती है। वर्जना और उच्छृंखलता सामाजिक प्रेम के अनिवार्य अंग हैं। सामाजिक प्रेम, प्रेम के दो ही रूपों को जानता है- एक, दबा हुआ प्रेम जिसको वे मर्यादित प्रेम कहते हैं, दूसरा दबाव की प्रतिक्रिया में उत्पन्न प्रेम जिसे वे उच्छृंखल प्रेम कहते हैं। इसलिए इस श्रेणी के लोग उस प्रेम की कल्पना भी नहीं कर पाते हैं जो न दबा होता है और न उच्छृंखल। प्राकृतिक प्रेम अपने में मस्त रहने वाला और दूसरों की मस्ती का ख्याल रखने वाला सहज स्फूर्त प्रेम होता है। उसकी स्वच्छंदता किसी प्रतिक्रिया की देन नहीं, वह हृदय का उल्लास है। 

15. सामाजिक प्रेम में वर्जना के कारण अनेक विकार पैदा होते हैं। अपने ही कुटुम्ब में चुपके से यौन संबंध स्थापित हो जाता है। प्राकृतिक प्रेम वर्जनारहित होने के कारण इस विकार से रहित होता है।

16. सामाजिक प्रेम में प्रायः सभी दूसरे की घरों की स्त्रियों पर नजर गड़ाये रखते हैं और अपने घर की स्त्री पर पहरा देते हैं। इसकी वजह से सभी पाखंडपूर्ण जीवन जीते हैं, क्योंकि अंदर का मन ललचाया रहता है, ऊपर का मन शराफत दिखलाता है। प्राकृतिक प्रेम मनुष्य की इस प्रवृत्ति को सहजता से स्वीकार करता है, इस आकर्षण को सुंदर रूप में ढाल देता है और उसे कभी अशोभन नहीं होने देता।
वर्जना के कारण समाज में लूहेड़ों, लफंगों, विकृत ढंग के शर्मीलों की संख्या बहुतायत होती है। सड़कों, बाजारों, शिक्षण संस्थानों में स्त्रियों को घूरना, छेड़छाड़ करना वर्जना का प्रतिफल है।
प्राकृतिक प्रेम में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि ये विकार दूरी के कारण उत्पन्न होते हैं। प्राकृतिक प्रेम स्त्री पुरुष को साथ रहने-जीने का अवसर देता है, इसलिए इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती।

17. सामाजिक प्रेम में बुढ़ापे तक यौन अभिलाषा दबी अवस्था में बनी रहती है। जबकि प्राकृतिक प्रेम में एक अवस्था के बाद यौन लिप्सा समाप्त हो जाती है।

18. सामाजिक प्रेम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सेक्स की खरीद बिक्री की धुरी पर टिका होता है। वेश्यालय, कॉल गर्ल आदि खरीद बिक्री के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। लेकिन सामाजिक जीवन में जो सेक्स के पेशेवर व्यापारी नहीं हैं, वे भी किसी न किसी स्वार्थवश सेक्स की खरीद फरोख्त करते हैं। कभी कोई सुविधा, कभी रिजल्ट, कभी नौकरी, कभी प्रमोशन आदि प्रदान कर नाना रूपों में अंदर अंदर सेक्स खरीदा जाता है। विवाह, जिसको हम अत्यन्त पावन संबंध मानते हैं, जिस पर गर्व करते हैं, वहाँ भी जीवन भर के लिए सेक्स का सौदा होता है। शुरू में दहेज के रूप में लड़के खरीदे जाते हैं, बाद में पति सेक्स की कीमत जिंदगी भर की कमाई पत्नी को देकर चुकाते हंै।
प्राकृतिक प्रेम सेक्स के लिए कोई चार्ज नहीं करता, उसे उन्मुक्त रखता है- बिल्कुल फ्री। वह सिर्फ दो व्यक्तियों की इच्छा पर निर्भर है।

19. सामाजिक प्रेम में स्त्री पुरुष एक दूसरे को बाँधकर रखना चाहते हैं, प्राकृतिक प्रेम एक दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करता है। यह बात ध्यान में रखने की है कि अगर लव मैरिज करने वाले प्रेमी जोड़े एक दूसरे को स्वतंत्रता न दें, बाँधकर रखें, ईष्र्या से भर जायँ, तो वह भी सामाजिक प्रेम ही होकर रह जायेगा। इसीलिए प्राकृतिक प्रेम एक साधना है। तपस्या के बिना इस प्रेम का रस नहीं चखा जा सकता है। तपस्या के अभाव में सामाजिक प्रेम के भीतर ईष्र्या, द्वेष, कलह, क्रोध, आरोप-प्रत्यारोप, हिंसा, गुलामी, पाखंड आदि का साम्राज्य रहता है, जबकि प्राकृतिक प्रेम मंे सद्भाव, मैत्री, सहयोग, करुणा, अहोभाव और उमंग की तरंगें उठती हैं। 

20. एक विचित्र विरोधाभास है कि सामाजिक प्रेम में पति पत्नी एक दूसरे को गुलाम बनाकर भी बाँध नहीं पाते, वे उससे छिटक जाना चाहते हैं और कभी छिटक भी जाते हैं; जबकि प्राकृतिक प्रेम मंे एक दूसरे को दी गयी स्वतंत्रता ही उन्हें एक दूसरे से बाँध देती है।
सामाजिक प्रेम की एकनिष्ठता समाज, परिवार, परंपरा, कानून आदि द्वारा आरोपित है। प्राकृतिक प्रेम की एकनिष्ठता आत्मा द्वारा प्रेरित, ऐच्छिक है।

21. सामाजिक प्रेम का केन्द्र बिन्दु है ईष्र्या। समाज के लगभग सारे नियम, कानून और नैतिकता ईष्र्या को केन्द्र में रखकर बनाये गये हैं। प्राकृतिक प्रेम का केन्द्र बिन्दु है स्वतंत्रता। अगर प्रिय पात्र की भावधारा दैवयोग से किसी अन्य की ओर बहने लगे और यह बात अखरने लगे तो भी उसका विवेकशील मन कोई अशोभनीय काम नहीं करेगा। प्राकृतिक प्रेम ज्यादा से ज्यादा अनुनय विनय कर सकता है, उसे एकांत तपश्चर्या में तब्दील कर सकता है, लेकिन किसी भी हालत में अपने प्रिय पात्र को ठेस नहीं पहुँचा सकता है।
सामाजिक प्रेम इसकी परवाह नहीं करता। वह येन केन प्रकारेण अपने प्रिय पात्र को हासिल करना चाहता है। हासिल न होने पर वह हिंसक हो सकता है। जिस पर कल तक मरता था, आज उसी को मारने को उतारू हो जाता है।

22. सामाजिक प्रेम को प्राकृतिक प्रेम की आजादी सुहाती नहीं। वह पूछता है, यह कैसा प्रेम है जो किसी एक को तड़पता छोड़ कर दूसरा किसी अन्य के पास चला जाता है! वास्तव में किसी को तड़पता छोड़ कर किसी दूसरे के पास जाना केवल सामाजिक प्रेम में होता है। कोई किसी के लिए सच्चे भाव से तड़पे और प्रेमी उसे छोड़कर दूसरे के पास चला जाय, यह संभव नहीं। प्यार की तड़प और अधिकार भावना के मद में किसी को जबर्दस्ती बाँधकर अपने अधीन रखने की तड़प में आकाश पाताल का अंतर होता है!

23. सामाजिक प्रेम का आधार पाखंड है। स्त्री पुरुष एक दूसरे से भय के कारण छिपाव रखते हैं। अंदर कुछ, बाहर कुछ। प्राकृतिक प्रेम में हृदय निर्मल रहता है। कोई दुराव छिपाव नहीं। अंदर बाहर की एकता बनी रहती है। इसलिए कोई भेद खुलने का डर नहीं रहता। भय सामाजिक प्रेम को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है, क्योंकि जहाँ भय है, वहाँ प्रेम नहीं हो सकता। तुलसीदास जब कहते हैं- ‘बिनु भय होहिं न प्रीति’- तो यह मनोविज्ञान की कसौटी पर सही नहीं उतरता। वास्तविकता यह है कि प्रेम और भय एक दूसरे के विपरीत हैंं। दोनों एक जगह निवास नहीं कर सकते।

24. सामाजिक प्रेम माता-पिता, परिवार और समाज के द्वारा नियमानुसार प्रायः सबको मिल जाता है। प्राकृतिक प्रेम प्रकृति का मनुष्य को सर्वोत्तम उपहार है। लेकिन इस उपहार को बचाये रखने के लिए परिवार और समाज से कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, कभी कभी कानून से भी। सामाजिक प्रेम मुफ्त मंे मिलता है, इसलिए उसकी कोई ज्यादा कीमत नहीं होती। प्राकृतिक प्रेम लड़कर हासिल करना पड़ता है, इसलिए भी बेशकीमती हो जाता है। 

25. प्राकृतिक प्रेम को सामाजिक प्रेम से डर नहीं लगता, लेकिन सामाजिक प्रेम प्राकृतिक प्रेम के भय से थर थर काँपता है। अपनी सुरक्षा को लेकर वह इतना भयभीत रहता है कि प्राकृतिक प्रेम पर अनेक तरह से हमला बोल देता है। कारण क्या है ? प्राकृतिक प्रेम अपने आप में संतुष्ट रहता है। वह सामाजिक प्रेम की तरफ ललचायी नजरों से नहीं देखता, लेकिन सामाजिक प्रेम अतृप्त रहने के कारण प्राकृतिक प्रेम की ओर हसरत भरी निगाह से देखता है। दुखियों की बस्ती में कोई एक सुखिया हो तो उसका सुख कैसे देखा जायेगा ? उसे अपने जैसा बना लेने से थोड़ी तसल्ली दिल को मिलती है। इसलिए वह उस पर हमला होता है। अपने जैसा बनाने की चेष्टा सामाजिक प्रेम की ओर से सदैव चलती रहती है।

26. प्राकृतिक प्रेम ताकतवर होता है। प्रकृति की सत्ता में अपनी सत्ता लय करने के कारण प्रकृति की शक्ति उससे आ मिलती है; लेकिन सामाजिक प्रेम प्रकृति से अपने को काट लेने के कारण पुरुषार्थहीन हो जाता है, दुर्बल, क्षीणकाय और रुग्ण। यही कारण है कि लाखों सामाजिक प्रेमियों पर एक प्राकृतिक प्रेमी भारी पड़ जाता है। इसलिए सामाजिक प्रेमियों में जो कुटिल होते हैं, अतिशय रूढ़िअंध होते हैं, वे आक्रामक हो उठते हैं। लेकिन सामाजिक प्र्रेमियों में जो लोग सरल, निश्च्छल और सहृदय होते हैं, उन्हें प्राकृतिक प्रेमियों से मिलकर सुकून मिलता है। उन्हें लगता है- यही मेरी भी मंजिल थी, लेकिन दैवयोग से पा न सका। वह उसके समर्थन में खड़ा हो जाता है। उसके पक्ष में दलीलें देने लगता है और चाहने लगता है कि ऐसा ही प्रेम फैले ताकि एक संुदर प्रेमपूर्ण समाज बन सके। प्राकृतिक प्रेम के पक्ष में ऐसे लोगों के खड़े हो जाने से विरोध और समर्थन का एक संतुलन बन जाता है। इस तरह प्राकृतिक प्रेमियों को इन दरिंदों से अक्सर सुरक्षा मिल जाया करती है।

27. सामाजिक प्रेम में तलाक की प्रक्रिया बहुत जटिल है, क्योंकि इसमें खासकर स्त्रियाँ मानसिक और आर्थिक रूप से गुलाम होने के कारण तलाक के लिए तैयार नहीं होती हैं। वे बिना प्रेम के भी संबंध को चलाना चाहती हैं। लेकिन प्राकृतिक प्रेम में किसी का मन उखड़ जाए तो वे प्रेम से एक दूसरे को धन्यवाद देते हुए अलग हो सकते हैं। कारण, इसमें कोई किसी के गुलाम नहीं होते। दोनों प्रायः आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हुआ करते हैं। 
संबंध विच्छेद की घड़ी में सामाजिक प्रेम अपना छिपा हुआ कुत्सित रूप प्रदर्शित कर देता है। गाली गलौज, मार पीट, केसा केसी, थुक्कम  फजीहत, इज्जत उतारने, नीचा दिखाने, बदला लेने आदि की प्रवृत्तियाँ अंदर से बाहर निकलकर अपना वास्तविक रूप प्रकट कर देती हैं।
सामाजिक प्रेम जब टूटता है तो कहता है- न हम जीयेंगे, न तुम्हें जीने देंगे। प्राकृतिक प्रेम जब टूटता है तो कहता है- तुम भी जीयो, हम भी जीयें। विच्छेद के बाद भी वे एक दूसरे के जीने में मदद करते हैं।

28. सामाजिक प्रेम सेक्स को गंदा समझता है। सेक्स के प्रति गंदी दृष्टि का व्यापक प्रभाव सामाजिक जीवन पर पड़ता है। व्यक्ति सेक्स का भरपूर आनंद नहीं उठा पाता, क्योंकि उसके चेतन अथवा अवचेतन मन में उसके प्रति खराब भाव रहता है। शायद इसीलिए वह सोचता है, सेक्स आनंद उठाने के लिए नहीं, बच्चा पैदा करने के लिए बना है। चूँकि गंदे काम से बच्चा आता है, इसीलिए उससे भी इस वास्तविकता को छिपाया जाता है। एक बड़ा बच्चा जब देखता है कि घर में एक नया बच्चा आ गया है तो अत्यंत कुतूहल से कभी कभी वह पूछता है- बौआ कहाँ से आया ? माता पिता कहते हैं- बाजार से खरीद कर लाये हैं। एक झूठ का संस्कार उसके बालपन में ही बो दिया जाता है।
प्राकृतिक प्रेम सेक्स को परम पावन समझता है। इसीलिए वह सेक्स को लेकर अपराध बोध से ग्रसित नहीं होता। वह निद्र्वन्द्व भाव से सेक्सानंद उठाता है। वह सेक्स को ब्रह्मचर्य में रूपांतरित करने की कला भी सीखता है। महान सद्गुरु ओशो ने दमनमूलक ब्रह्मचर्य की रुग्णता से मनुष्य जाति को बचाने के लिए सहज ब्रह्मचर्य के प्रतिफलन का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी मूल देशना है- न दमन, न भोग बल्कि रूपांतरण। सेक्स का रूपांतरित करने की कला उन्होंने दुनिया को सिखाकर उसे घातक बीमारी से बचा लिया है।

29. सामाजिक प्रेम मृत्यु से भयभीत रहता है, प्राकृतिक प्रेम मृत्यु से निर्भय होता है और उसे जानना चाहता है। वह एक प्रकार से मृत्यु से साक्षात्कार भी कर चुका होता है। उसके पास जो कुछ पुराना होता है, समाज का दिया हुआ पुराना संस्कार, स्वार्थांध पारिवारिक सामाजिक संबंध आदि प्रेम की अग्नि में भस्मीभूत हो जाता है और एक नये मनुष्य का जन्म होता है। नवीन भाव, नयी अनुभूति उसके पास होती है और इस अनुभूति के सहारे मृत्यु को जानने के लिए लालायित हो उठता है और अगर प्यास सघन हो तो वह जान भी सकता है।

30. सामाजिक प्रेम और प्राकृतिक प्रेम दोनों को प्रशिक्षण की जरूरत होती है। सामाजिक प्रेम के प्रशिक्षक हैं परिवार, समाज और परंपरा। प्राकृतिक प्रेम के प्रशिक्षक होते हैं सद्गुरु। जिनके माता पिता अच्छे हैं, परिवार अच्छा है, उन्हें एक हद तक सही शिक्षा मिलती है, लेकिन जिनके माता पिता ही नासमझ हों, उनके तो भगवान ही रखवाले ! सही शिक्षा के अभाव में सामाजिक प्रेम में लोमहर्षक घटनाओं की खबरें हर दिन आती ही रहती हैं। हाल  में दरभंगा जिले के टकनीया गाँव के हीरा यादव ने क्रोधोन्मत्त होकर अपनी पत्नी रीना देवी का सर काता से काट लिया। एक हाथ में मुंड का बाल पकड़े और दूसरे हाथ में काता लेकर माँ काली जैसा विकराल रूप धारण कर वह गाँव में निकल पड़ा !
प्राकृतिक प्रेम सद्गुरुओं के मार्गदर्शन में उत्तरोत्तर आनंद की ओर बढ़ता चला जाता है। जिन्हें अनुकूल सद्गुरु पकड़ा गया, उनका बेड़ा पार है।

31. एक तरह की शिक्षा होने के कारण सामाजिक प्रेम एक समान, सपाट और सतही होता है। लेकिन व्यक्ति की प्रकृति के अनुकूल प्राकृतिक प्रेम भिन्न भिन्न हुआ करता है। स्वार्थमूलक शिक्षा के कारण सामाजिक प्रेम परिवार कल्याण तक ही सीमित रहता है, जबकि प्राकृतिक प्रेम विश्व कल्याण की ओर अग्रसर होता है। सामाजिक प्रेम का परिवार वहीं तक होता है, जहाँ तक उसके रक्त संबंधी होते हैं। प्राकृतिक प्रेम का परिवार वहाँ तक फैला होता है जहाँ तक उनके भाव फैले होते हैं, हृदय मिलते हैं। यानी सामाजिक प्रेम का परिवार यौन संबंध पर टिका होता है, जबकि प्राकृत प्रेम का परिवार भाव संबंध पर। सामाजिक प्रेम का परमार्थ एक ढोंग होता है। उसके परमार्थ के भीतर भी स्वार्थ छिपा होता है। प्राकृतिक प्रेम के स्वार्थ के भीतर भी परमार्थ होता है। तुलसी का ‘स्वान्तः सुखाय’ भी परमार्थ से पूर्ण है जबकि देशप्रेम का राग अलापने वाले नेताओं का परमार्थ भी कुत्सित स्वार्थ से ग्रस्त।

32. सामाजिक प्रेम अंधा होता है, क्योंकि उसमें वासना की प्रधानता होती है और वासना अंधी होती है। प्राकृतिक
प्रेम के पास आँखें होती हैं। वे आँखें भाव की, हृदय की और आत्मा की होती हैं।

33. सामाजिक प्रेम में जड़ता होती है, प्राकृतिक प्रेम में जागरुकता।

34. सामाजिक प्रेम यथार्थ है, प्राकृतिक प्रेम आदर्श। सामाजिक प्रेम सर्वत्र व्याप्त है, प्राकृतिक प्रेम कहींं कहीं खिलता है- लाखों में कोई एक प्राकृतिक प्रेम को उपलब्ध होता है।

35. सामाजिक प्रेम कोई कला नहीं है, प्राकृतिक प्रेम एक कला है। जिस दिन वह कला का दामन छोड़ देगा उस दिन प्राकृतिक प्रेम भी सामाजिक प्रेम की तरह मरियल और निष्प्राण हो जायेगा।

ऊपर हमने दोनों प्रेमों के बीच जितने भेद गिनाये हैं, वे उतने भर ही नहीं हैं, और भी हैं। लेकिन इन भेदों का सिलसिला यहीं समाप्त करता हूँ , क्योंकि इतने भी यहाँ पर कम नहीं हंै।
अंत में पुनः स्पष्ट कर दूँ कि यह विभाजन गुण की प्रधानता के आधार पर किया गया है। कोई भी विभाजन प्रधानता के आधार पर ही होता है। सामाजिक प्रेम में भी प्राकृतिक प्रेम के कुछ अंश हो सकते हैं और प्राकृतिक प्रेम में भी सामाजिक प्रेम के कुछ अंश। यहाँ मैंने कसौटी रखी है जिस पर कोई भी आदमी अपने प्रेम को जाँच सकता है। जिसके प्रेम में जिस श्रेणी के लक्षण ज्यादा पाये जायेंगे उसका प्रेम उसी श्रेणी में आयेगा।

Monday, October 03, 2011

प्रेम न जानै जात...



 प्रश्न सं. 3.  कहा जाता है कि प्यार किसी जाति, धर्म, उम्र को नहीं मानता। ऐसे में घर-समाज के बीच कैसे तालमेल बैठाया जाय ?
‘प्रेम के प्रकार’ शीर्षक लेख में मैंने प्रेम के दो मुख्य भेद बताये हैं- प्राकृतिक और सामाजिक। जाति और धर्म प्राकृतिक चीज नहीं है, सामाजिक है। इसलिए केवल सामाजिक प्रेम जाति और धर्म को मानेगा जबकि प्राकृतिक प्रेम स्वभाववश इनकी बंदिशों का उल्लंघन करेगा। प्राकृतिक प्रेम की अपनी जाति होती है जो जन्म के आधार पर नहीं स्वभाव के मेल के आधार पर तय होती है। जन्म के आधार पर जो जाति समाज में प्रचलित है, वह भ्रामक है, वास्तविक जाति नहीं। उसका उपयोग समाज के धूर्त लोग अपने स्वार्थ के लिए और राजनेता वोट के लिए करते हैं। जाति शोषण का एक महत्वपूर्ण औजार है, इसलिए शोषक वर्ग इसे हर हालत में बचाकर रखना चाहता है। प्राकृतिक प्रेम ही इसको नेस्त नाबूद कर सकता है।
धर्म क्या है ? जो हिन्दू घर में पैदा हो गया, वह हिन्दू और जो मुस्लिम घर में जन्मा, वह मुस्लिम ! समाज में यही धर्म का अर्थ है न ? धर्म इतना सस्ता नहीं है भाई कि वह जन्म लेते ही मिल जाय। इतना सस्ता होता तो पूरी धरती धार्मिक हो गयी रहती ! धर्म फोकट में मिलने वाली चीज नहीं है। इसे अर्जित करना पड़ता है। धर्म का चुनाव होता है। जो साधना पद्धति या जीवन शैली जिसके स्वभाव के अनुकूल होगी, वही उसका धर्म होगा। धर्म का अर्थ है स्वभाव में जीना। धर्म का जन्म से कोई संबंध नहीं है। एक हिन्दू नवजातक को मुसलमान के यहाँ रख दीजिए और मुसलमान बच्चे को हिन्दू के यहाँ, हिन्दू मुसलमान हो जायेगा और मुसलमान हिन्दू। जन्म से धर्म का नाता होता तो हिन्दू हिन्दू रहता और मुसलमान मुसलमान; चाहे उसे जिस घर में पालिये।
सामाजिक प्रेम विवाह के अधीन है और विवाह धर्म और जाति के अधीन। गुलामी की अनेक परतों के बीच  पलने के कारण सामाजिक प्रेम मनुष्य के आत्मिक विकास में सहायक नहीं होता। उसमें साथी के प्रति अधिकार का भाव प्रधान होता है, समर्पण का नहीं। यहाँ समर्पण का सही अर्थ समझ लेना जरूरी है। साधारण बोलचाल में हम जिसे समर्पण कहते हैं वह वास्तव में पति अथवा पत्नी से समर्पण करवाने की युक्ति मात्र है। वास्तविक समर्पण एक दुर्लभ घटना है। हृदय की मुक्त अवस्था में ऐसी दिव्य घटना घटती है। सामाजिक प्रेम का मतलब होता है- बच्चा पैदा करना, पढ़ाना-लिखाना और परिवार को चलाना। इसके लिए दूसरे का गला काटना पड़े तो काट लेना। अपने बच्चे और परिवार की रक्षा के लिए दूसरों के बच्चों और परिवार का नुकसान भी करना पड़े तो आराम से करना।
प्राकृतिक प्रेम वसुधा को ही कुटुम्ब मानता है- वसुधैव कुटुम्बकम्। प्राकृतिक प्रेम एक ऐसा बीज है, जिसकी ठीक से देख रेख और लालन पालन हो तो वह ऐसा विशाल वृक्ष बनेगा जिसकी फुनगियाँ आकाश से बातें करेंगी, जिसके फूलों की खुशबू हवा में चारों तरफ फैलेगी। जैसे हवा न हिन्दू होती है, न मुसलमान; वैसे ही प्राकृतिक प्रेम किसी धर्म या जाति का नहीं होता। लेकिन सामाजिक प्रेम इन बंधनों में जकड़े होने के कारण प्रेम कहलाने के लायक भी नहीं रह जाता। प्राकृतिक प्रेम का अपना एक समाज हो सकता है। वह समाज एक ऐसे विशाल परिवार की तरह होगा जिसमें सभी प्रेम से आनंदपूर्वक रहेंगे लेकिन कोई किसी पर अपना अधिकार नहीं जमायेगा। इस कल्पना को साकार किया था ओशो ने अमेरिका के ‘रजनीशपुरम’ में। इस पर दूसरा प्रयोग ओशो की प्रतिभासम्पन्न, ओजस्वी और सृजनशील शिष्या माँ आनन्द शीला भारत में ‘प्रेमपुरम्’  की स्थापना के द्वारा करना चाहती हंै। अगर यह प्रयोग शुरू होता है तो इसमें हमारा भी जीवन लगेगा। इस प्रयोग के द्वारा समाज के सामने नजीर प्रस्तुत की जा सकती है कि देखो यह भी एक परिवार है जो प्रेमपूर्ण है; जहाँ न ईष्र्या है, न द्वेष, न कलह, न झगड़ा, न झंझट। केवल प्रेम है, सहयोग है, मैत्री है, आनंद है, अहोभाव है ! रही उम्र की बात। एक खास अवस्था में मानव शरीर में सेक्स का उदय होता है, धीरे धीरे बढ़ता है, चरम सीमा तक जाता है, फिर ढलान शुरू होती है, सेक्स की शक्ति घटने लगती है। घटते घटते सेक्स क्षमता जीरो पर आ जाती है। चूँकि सामाजिक प्रेम के केन्द्र में सेक्स होता है और ढलती उम्र में सेक्स क्षमता क्षीण हो जाती है;  
इसलिए इस प्रेम को जीनेवाले लोग अधिक उम्र में प्रेम की घटना देख अचंभे में पड़ जाते हैं ! वे सोचते हैं यह कैसे हो सकता है ? अगर ऐसा हो गया है तो टिकने वाला नहीं है, क्योंकि वृद्ध आखिर सेक्स की यात्रा कब तब कर पायेगा ? जब कुछ समझ में नहीं आता तब आदमी लाचार होकर यह सोचने लगता है कि किसी अन्य लोभ-लाभ में ऐसा प्रेम चल रहा होगा। वे ऐसा इसलिए भी सोच पाते हैं कि विवाह का आधार भी तो लोभ-लाभ ही है ! दहेज जैसी घृणित चीज सामाजिक प्रेम में बड़प्पन का मानदंड है !
सामाजिक प्रेम जीने वालों की बड़ी विडंबना यह है कि वे जीते तो हैं सेक्स में, किन्तु उसी से घृणा भी करते हैं और उसकी भत्र्सना भी करते हैं ! भाषण और लेखन में हमेशा वासनाहीन प्यार की वकालत करते हैं ! इसके ठीक उलट प्राकृतिक प्रेम वाले वासना की महिमा को स्वीकार करते हैं। उसका सारा रस निचोड़ते हैं और छककर पान करते हैं। उसकी कभी निंदा नहीं करते। वासना की गहराई में डूबने से उसकी सीमा भी उनके सामने प्रकट होने लगती है। इसलिए उच्चतर आनंद की तलाश में वे अपनी वासना को ब्रह्मचर्य में रूपांतरित करने की चेष्टा करते हैं और उनमें से कुछ सफल भी होते हैं। वासना को दबाकर जो ब्रह्मचर्य उपलब्ध किया जाता है, वह अनेक मानसिक रोगों को जन्म दे देता है। अहंकार, क्रोध, जलन आदि उसकी बीमारियाँ हैं। 
सेक्स का संबंध शरीर से है, लेकिन प्रेम का संबंध शरीर से ज्यादा मन से है, भाव से है। इसलिए भावपूर्ण प्रेम उम्र का अतिक्रमण कर जाता है। वह उम्र को नहीं मानता। जो प्रेम उम्र को न माने समझिये भाव का है। प्रेम की यात्रा भाव से भी आगे बढ़ती है। कहते हैं, यह आत्मा तक पहुँचती है और जन्म जन्मांतर तक चल सकती है। वहाँ तक यात्रा करना बहुत रोमांचक हो सकता है। जो लोग सेक्स को ही प्रेम समझते हैं, उनका कहना ठीक है कि बुढ़ापे में प्रेम दुखदायी हो जाता है। इसलिए सामाजिक प्रेम करने वालों को उम्र का बंधन स्वीकार लेना चाहिए। लेकिन जो प्रेम को इससे अलग भी कुछ समझते हैं, उनके लिए प्रेम सदा सुखदायी है। इसलिए प्राकृतिक प्रेम में उम्र का कोई बंधन नहीं होता। वहाँ हर उम्र प्यार की उम्र होती है। हर मौसम प्यार का मौसम होता है।
  सामाजिक प्रेम की सबसे बड़ी चिंता किसी भी तरह समाज चलाने की होती है। इसमें प्राकृतिक प्रेम उसे सबसे बड़ा खतरा नजर आता है ! इसलिए प्राकृतिक प्रेम का विरोध किया जाता है और उसे हर तरह से कुचलने की चेष्टा की जाती है। आप पूछते हैं राजीव मणिजी कि प्राकृतिक प्रेम घर-समाज के बीच कैसे तालमेल बैठायेगा ? मैं कहना चाहता हूँ कि समाज के साथ तालमेल बैठाने की जरूरत क्या है ? फायदा क्या होगा ? यह समाज तो भ्रष्ट है, इसके साथ ऐसे प्रेम का तालमेल कैसे बैठेगा ? क्या जीवन किसी तरह तालमेल बैठाकर घिसट घिसट कर जीने के लिए है ? जीवन तो रूपांतरण के लिए है। जो प्रेम रूपांतरण में सहायक हो, सिर्फ वही वरेण्य है। इस तरह के प्रेम के सहारे अपना जीवन रूपांतरित करते हुए समाज का निर्माण करना है। नया समाज ज्यों-ज्यों बनने लगेगा, त्यों-त्यों वर्तमान समाज अपने आप विदा होने लगेगा। इसे ध्वस्त करने की सलाह नहीं दे रहा हूँ , क्योंकि नया जब आता है तो पुराना अपने आप विदा होने लगता है। उसे अलग से विदा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिए नये समाज के निर्माण के लिए चिंतन और प्रयास करने की बात कह रहा हूँ । एक ऐसा समाज जो व्यक्तियों के प्रेम को फैलने के लिए पूरा आकाश उपलब्ध कराये। जिस समाज में अधिकांश व्यक्ति प्रेमपूर्ण होंगे, वही स्वस्थ, सुंदर और शिष्ट समाज हो सकता है।

Monday, September 26, 2011

प्रेम के प्रकार


Q No. 2. आपकी नजर में आज प्यार को किस रूप में लोग लेते हैं ?

प्यार को समाज में अच्छे-बुरे सब रूपों में लिया जाता है। लोग एक तरह के हैं नहीं, अनेक तरह के हैं।  इसलिए प्यार के प्रति उनकी दृष्टियाँ भिन्न भिन्न हैं।
प्यार को सिरे से खारिज करने वाला आदमी शायद एक भी न मिले। सिर्फ प्यार के स्वरूप को लेकर मतभेद   है। प्यार का एक रूप वर्ग विशेष को पसंद है तो दूसरे वर्ग को वह बिलकुल नापसंद है। इसलिए यहाँ पर संक्षेप में प्यार के विविध रूपों को रखना चाहूँगा।
जितने भी प्रकार के प्रेम हैं, उन्हें दो रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है। प्रेम का एक रूप वह है जो आपके भीतर उतरता है और पूरी तरह आप पर कब्जा जमा लेता है। उस अवस्था में आप प्यार के वश में होते हैं, आपका प्यार पर कोई वश नहीं होता। प्यार जैसे आपको नचाता है, नाचते हैं, जिधर ले जाता है, जाते हैं। प्यार आपका मालिक है, आप उसके सेवक हैं। मेरी नजर में ऐसा प्रेम ही वास्तविक और सर्वश्रेष्ठ है। मीरा, कबीर, तुलसी, नानक, दादू इत्यादि के प्रेम इसी श्रेणी के शिखर हैं। लैला-मजनू, शीरी-फरहाद आदि जोड़ियाँ भी जुनूनी हैं। अंतर इतना है कि इन जोड़ियों के पास प्रेम विरह तक सिमटा रह गया और वह विस्तार नहीं पा सका। वह संभवतः आत्मा की गहराई तक उतरते उतरते रह गया।
पहले प्रकार के प्रेम को आप परमात्मा के द्वारा बनाया हुआ प्रेम, प्राकृतिक प्रेम, नैसर्गिक प्रेम, स्वाभाविक प्रेम, स्वच्छन्द प्रेम आदि कह सकते हैं। स्वच्छंद शब्द बहुत प्यारा है। इसका माने है अपनी लय में, अपने छंद में जीना। यह स्वतन्त्र शब्द से भी ज्यादा सुंदर है। स्वतंत्र का अर्थ है अपने तंत्र में अर्थात् अपने शासन में जीना। छंद आंतरिक चीज है, तंत्र बहुत कुछ बाह्य है। शासन अपना ही क्यों न हो, है तो शासन ही न! दुर्भाग्य से स्वच्छन्द शब्द ‘मनमानी’ के अर्थ में प्रचलित होकर अपनी अर्थवत्ता से बहुत दूर चला गया है।
प्राकृतिक प्रेम या स्वच्छन्द प्रेम के अनंत रूप हैं। चूँकि हर मनुष्य की प्रकृति अलग-अलग होती है, इसलिए प्राकृतिक प्रेम भी उसकी प्रकृति के अनुसार अलग अलग होता है। समाज में इस श्रेणी के प्रेमियों की संख्या दुर्लभ है। इस तरह के प्रेम में बड़ी ताकत होती है। वह समाज को दूर दूर तक लंबे समय तक प्रभावित करता है। जब तक ऐसे प्रेमी जिंदा रहते हैं, तब तक प्रभाव छोड़ते रहते हैं। उनके मरने के बाद धीरे धीरे प्रभाव क्षीण पड़ता है और समाप्त हो जाता है। जब ऐसा प्रेम प्रभावशून्य होकर जीवन से बाहर हो जाता है, तब हम उसकी पूजा शुरू कर देते हैं। उन्हें मंदिर में स्थापित कर देते हैं। कृष्ण और राधा की हम पूजा करते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में कृष्ण और राधा दिखाई पड़े तो उन्हें जिंदा जला देते हैं ! इस तरह की पूजा कर्मकांड बनकर निरर्थक हो जाती है और बहुत बार हानिकारक भी होती है।
हिन्दी के स्वच्छंद कवि घनानंद की एक पंक्ति याद आ रही है-
‘लोग हैं लागि कबित्त बनावत, मोहि तौ मेरे कबित्त बनावत’
लोग सायास कविता बनाते हैं, लेकिन मुझे तो मेरी कविता ही बनाती है। यानी कविता अपने आप बनती है, मैं नहीं बनाता। कविता जब स्वतः उतरती है तो उसकी खुशबू कुछ और होती है, लेकिन जब बनायी जाती है, तो वह बात नहीं रह जाती। ऐसे ही प्रेम जब स्वयं उतरता है, तो स्वर्गीय सुगंध से युक्त होता है, लेकिन जब उसे निर्मित किया जाता है, तो वह दोयम दर्जे का होता है।
दूसरे प्रकार का प्रेम सामाजिक है। वह मनुष्य निर्मित प्रेम है। समाज उसकी मर्यादा तय करता है और एक खास सीमा में प्रेम को चलाने की इजाजत देता है। पटना के पास दानापुर कंटोनमेंट के अंदर से जो सड़क गुजरती है, उसकी गति सीमा निर्धारित है। वहाँ सैनिकों का पहरा रहता है। किसी ने नियम तोड़ा कि डंडा बरसा, गाड़ी जप्त,कानूनी कार्रवाई शुरू ! सामाजिक प्रेम को भी इसी तरह एक खास गति सीमा में चलाने की इजाजत है। इसे विवाह के अंतर्गत चलाने की आज्ञा है। विवाह मालिक है, प्रेम उसका नौकर। कहा जाता है कि इससे समाज सुचारु रूप से चलता है ! विवाह के बाहर का प्यार अनैतिक माना जाता है !
विवाह के मुख्यतः दो रूप हैं- पहला अरेंज मैरिज और दूसरा लव मैरिज। लव मैरिज को प्राकृतिक प्रेम के अंतर्गत मुझे रखना चाहिए था, लेकिन नहीं रख रहा हूँ; क्योंकि वह ज्यादातर पुरानी रूढ़ियों के अनुसार ही चलता है और विवाह में बदलकर तो अरेंज मैरिज जैसा ही हो जाता है। वह प्रेम अपनी मर्यादा के अनुसार नहीं, समाज की मर्यादा के अनुसार चलने लगता है, इसलिए स्वच्छंदता समाप्त हो जाती है। जिस प्रेम की मर्यादा प्रेम के भीतर से निकले वह स्वच्छंद प्रेम और जिसकी मर्यादा समाज निर्धारित करे, वह सामाजिक प्रेम। साफ शब्दों में कहूँ तो अपने छंद में ( लय ) में जीना स्वच्छंद प्रेम है और समाज के अनुसार जीना सामाजिक प्रेम है। सामाजिक प्रेम एक प्रकार की गुलामी है।
अरेंज मैरिज के भी अनेक रूप हैं। मैंने अपने बालपन में अरेंज मैरिज का एक दिलचस्प रूप देखा था। देखा कि नवविवाहित पति महोदय सबकी नजरों से बचते हुए चुपके से रात के अंधेरे में पत्नी-कक्ष में पहुँचते हैं। कुछ देर प्यार करते हैं। उसके बाद आहिस्ते दबे पाँव निकलकर पुनः दरवाजे पर जाकर सो जाते हैं। घर का कोई व्यक्ति पति को पत्नी के साथ रात में भी न देखे तो बड़ी सराहना होती थी। बुजुर्ग लोग अगर पति को सोते वक्त दरवाजे पर देखें और जगते वक्त भी वहीं पायंे, तो बड़े खुश होते थे। ऐसे दंपत्ति की इस ‘शालीनता और मर्यादित आचरण’ की सराहना होती थी। प्रेम का यह रूप अब लुप्त हो चुका है। आज का कट्टरपंथी भी इसे स्वीकार नहीं करेगा।
शुरू में अरेंज मैरिज में लड़की को विवाह पूर्व देखना प्रतिष्ठा के विरुद्ध बात थी, आज भी है, लेकिन धीेरे-धीरे यह बंधन टूट रहा है। कहीं कहीं इनगेजमेंट के बाद लड़का लड़की फोन पर परिवार की इजाजत से और कहीं इजाजत के बिना ही खूब बतियाते हैं। कभी कभी हॉल में सिनेमा भी देख लेते हैं, पार्क में, घर में या जहाँ तहाँ मिल भी लेते हैं। प्रेम विवाह का जितना विरोध पहले था, वह हल्का हुआ है। मैंने तो एक वज्र रूढ़िवादी को भी प्रेम विवाह स्वीकारते देखा। पिछले पचास वर्षों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो रहा है कि प्रेम की स्वीकृति की दिशा में समाज ने थोड़ी यात्रा की है, जो स्वाभाविक भी है। लेकिन इस मंथर गति से समाज को विकसित होने में सैकड़ों वर्ष लग जायेंगे। इसलिए समाज को एक प्रेम क्रांति और सेक्स क्रांति की जरूरत है। अगर विवेक के साथ इस क्रांति का स्वागत नहीं किया गया, तो अनेक विकृतियाँं आती रहेंगी। जिस शहर को सरकार किसी योजना के तहत तत्परतापूर्वक नहीं बसाती है, वहाँ बेतरतीब ढंग से लोग बस जाते हैं और तमाम परेशानियों का सामना करते हैं। वैसे ही अगर समाज सुविचारित ढंग से सेक्स-रूपांतरण की योजना तैयार नहीं करता है, तो यह बेतरतीब ढंग से चलता रहेगा। इससे कुंठाएँ पैदा होती रहेंगी, अपराध बढ़ते रहेंगे, हिंसा फैलती रहेगी।
तो भाई, समाज में प्रेम को अनेक रूपों में देखा जाता है। यह देखनेवालों की शिक्षा, संस्कार और विवेक पर निर्भर करता है। विवेकशील व्यक्ति प्रेम के मामले में बहुत उदार हैं। सुशिक्षित और सुसंस्कृत व्यक्ति प्रेम को बड़ी ऊँची नजर से देखते हैं। जो पढ़े लिखे नहीं हैं, लेकिन सरल हृदय के हैं, वे भी चाहे ग्रामीण हों या शहरी; प्रेम को बहुत आदर देते हैं। मैंने सिर्फ कुटिल हृदय, कुसंस्कारी और कुशिक्षित कट्टरपंथियों को जीवंत प्रेम के विरुद्ध आग उगलते देखा है। वे अवांछित मर्यादाओं के भीतर दम तोड़ते प्रेम को अपने संस्कार के मेल में पाते हैं। अपनी इच्छा के विरुद्ध प्रेम करने वालों के प्रति वे बड़े असहिष्णु होते हैं। उनकी प्रभाव छाया में पलने वाले मूढ़ भी उन्हीं का अनुसरण करते हैं।

Wednesday, September 21, 2011

प्रेम की परिभाषा



श्री राजीव मणि ने अपने ब्लॉग www. Manifeature.blogspot.com के लिए मेरा साक्षात्कार लिया है। उन्होंने दस प्रश्न लिख भेजे हैं, जिनके उत्तर मुझे भेजने हैं। पहले प्रश्न का उत्तर भेज चुका हूँ। उसे यहाँ भी प्रकाशित किया जा रहा है।

1. लवगुरु, प्यार क्या है ? आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे ? प्यार के लिए समाज में कैसे जगह बन सकती है?

मित्रवर ! प्यार की परिभाषा न ही पूछें तो अच्छा ! परिभाषा बुरी शिक्षा की देन है। विद्यार्थियों को परिभाषा में उलझा कर उसके स्वाद से वंचित रखने का यह खतरनाक षड्यंत्र है। पुस्तकें प्रेम की परिभाषाओं से पटी पड़ी हैं, पर समाज में प्रेम नहीं है। प्रेम की परिभाषा है, प्रेम नहीं है। पुस्तकों में प्रजातंत्र की परिभाषाएँ हैं, देश में सच्चा प्रजातंत्र नहीं है। शिक्षा की परिभाषाएँ हैं, लेकिन देश में सच्ची शिक्षा नहीं है। देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि कैसे उनके जीवन में प्रेम की रसधार बहे, कैसे देश को मुट्ठी भर स्वार्थी वर्चस्वधारी शोषकों-शासकों से मुक्ति दिलायी जाय, कैसे ऐसी शिक्षा प्रणाली लायी जाय जिसमें ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की परिभाषा साकार हो !
कोल्हू के बैल की तरह जिस लीक पर युवाओं को गोल-गोल घुमाया जा रहा है, जहाँ गति ही गति है, प्रगति कहीं नहीं है, उस लीक से मैं उन्हें बाहर खींचना चाहूँगा। आप प्रेम की परिभाषा नहीं खोजें, प्रेम खोजें। रसगुल्ले की परिभाषा की माँग न करें, रसगुल्ले का जुगाड़ करें। रसगुल्ले की परिभाषा से कहीं उसका स्वाद जाना जाता है ? वह तो मुँह में डालने पर ही जाना जा सकेगा। मेरा जोर स्वाद पर है, परिभाषा पर कतई नहीं। प्रेम का स्वाद चखते ही आदमी का रूपांतरण हो जाता है। साधारण लोक से वह असाधारण लोक में प्रवेश कर जाता है, जहाँ सुख और दुख की किस्में अलग हैं और जो हर हालत में प्राप्त करने योग्य हैं। प्रेम की परिभाषा जानने से आदमी के भीतर कोई बदलाव नहीं आता, कोई सुख नहीं उतरता।
समाज में प्यार की बयार बहाने के लिए एक प्रयोग मैंने करना चाहा था। जब मैं 2009 में संसदीय चुनाव लड़ने के लिए पटना साहिब से खड़ा हुआ था तो अपने घोषणा पत्र में कई महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ एक ‘लवर्स पार्क’ बनाने का इरादा व्यक्त किया था, लेकिन सत्ताधारियों को जनता का यह स्वर्ग पसंद नहीं था और उन्होंने जबरन अपनी ताकत का सहारा लेकर मेरा नामांकन रद्द करवा दिया। नामांकन रद्द करना उनके वश मंे था, मेरे सपनों को रद्द करना किसी के वश में नहीं है, वह अभी भी पल रहा है। अब तो ऐसे सक्षम साथियों का सहारा मिलने जा रहा है जिसमें यह सपना साकार होकर रहेगा। कम से कम एक हजार एकड़ भूमि में एक ऐसा ‘प्रेमपुरम’ बनेगा जिसमें दस हजार प्रेमी एक साथ एक प्रेम परिवार की तरह रहेंगे, जहाँ धरती पर प्रेम का स्वर्ग उतारने के लिए दिव्य प्रयोग होंगे।
प्रेम तो मनुष्य का स्वभाव है, वह तो अपने आप उत्पन्न होता है, सिर्फ उसके मार्ग की बाधाओं को हटाना पड़ता है। सबसे बड़ी बाधा है वह पुराना संस्कार जो अज्ञानतावश प्रेम से भयभीत है। इस जबर्दस्त संस्कार ने असमय ही युवाओं को बूढ़ा बना दिया है। भले ही उसका शरीर जवान हो, उसकी आत्मा बूढ़ी हो गयी है। जवान शरीर में जब बूढ़ी आत्मा को देखता हूँ , तो कराह उठता हूँ। हा विधाता, इस युवा को किस पाप का दंड दे रहे हो ! ‘प्रेमपुरम’ के आप भी भागीदार बनंे और इसकी स्थापना के लिए देश के किसी भी हिस्से में एक हजार एकड़ जमीन ढ़़ूँढ़ें और मिल जाय तो खबर करेंं। वहाँ प्रेम से जीने का स्वाद मिलना शुरू होगा। यह स्वाद ही प्यार को समाज में स्थान दिलाने में सहारा बनेगा।
कुछ साल पहले मीडिया ने जोर शोर से प्रचारित किया था कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ी है। दरअसल मैंने कोई परिभाषा नहीं गढ़ी, सिर्फ प्रेम को जीने का दुस्साहस किया। यह साहस जरूर नया था। प्रेम के लिए सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। तन-मन-धन और प्रतिष्ठा दाँव पर रखने में जो अनूठापन था, वह नया था। संभवतः इसी के आधार पर कहा गया कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा दी।

एक दूसरा कारण भी समझ में आता है। मेरा प्रेम समाज में प्रचलित मानदंड से ऊपर उठा दिखा होगा। समाज के अशिक्षित, अद्र्धशिक्षित और अविकसित समूह की मान्यता है- एक विवाहित आदमी दूसरी स्त्री से क्यों प्रेम करेगा भाई ? घर में पत्नी है, बच्चा है, उनसे प्यार करो ! और यह कोई अवस्था है प्यार करने की !! वह भी किसी और से नहीं, अपनी ही छात्रा से !!! धिक्कार है !!!! लेकिन इतनी ही बात होती तो मीडिया के प्रबुद्ध जन नहीं कहते कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ी है, क्योंकि इस तरह के प्रेम के घनेरों उदाहरण समाज में हैं, पहले भी थे, आगे भी रहेंगे। तो इसमें नया क्या है ? नया है इसको सही ठहराना, इसको स्वधर्म कहना- ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः’। प्रेम स्वधर्म है, मेरा परम धर्म है, इसका उद्घोष पूरे आत्मबल के साथ, पूरी सच्चाई के साथ करना और इसके लिए संपूर्ण सत्ता से टकरा जाना। इसके पहले इस श्रेणी के प्रेमी अपराध भाव से, हीन भाव से ग्रसित रहते थे। बहुत कुछ छिपाते भी थे, कुछ झूठ बोलते थे और आशा रखते थे कि इस छोटी-सी गलती को समाज माफ कर दे। लेकिन मैंने देखा कि मैं सही हूँ , रूढ़िवादी मान्यताएँ गलत हैं और उन मान्यताओं के सामने मैंने न तो घुटने टेके, न समझौता किया बल्कि पूरी ऊर्जा से उन्हें ललकार दिया। इस अनोखी ललकार में प्रबुद्ध लोगों को एक नयी ताजगी दिखी, घुटन से बाहर निकलने का रास्ता सूझा और उन्हें लगा कि यह तो प्रेम की नयी परिभाषा है !
दुनिया के अनेक भक्तों, प्रेमियों और कवियों ने प्रेम की असंख्य श्रेष्ठ परिभाषाएँ दी हैं। प्रेम की कोई परिभाषा छूटी नहीं। अब उनमें कुछ नया नहीं जोड़ा जा सकता। सिर्फ प्रेमपूर्ण ढंग से जिया जा सकता है। अगर हमने प्रेमपूर्ण ढंग से जीना सीख लिया तो दुनिया को एक नयी परिभाषा दे दी। शायद इसी को कहा गया होगा कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा दी ! हकीकत है कि मैं प्रेम की परिभाषा जानता ही नहीं- ‘दिल-विल प्यार-व्यार, मैं क्या जानूँ रे, जानूँ तो जानू बस इतना कि मैं तुझे  अपना जानू रे ’। दूसरा जब दूसरा न रह जाय,  अपना हो जाय तो प्यार है। प्यार दूरी पाट देता है, दो को मिलाकर एक कर देता है। यह प्यार पूरा विकास पाये तो पूरी दुनिया एक हो जाती है। ऋषि ने जब कहा- सोऽहम्- अर्थात् मैं वही हूँ , तो यह प्यार का ही उद्घोष है। जो तुम हो, वही मैं हूँ । जो मैं हूँ , वही तुम हो, इसका बोध ही प्यार है। इसी अवस्था में धरती से शोषण और भ्रष्टाचार पूर्णतः हट सकता है, अन्यथा नहीं।
लेकिन आपने प्रेम की परिभाषा पूछी है तो उसका एक अन्य कारण समझ में आ रहा है। प्रेम की परिभाषा जानने के पीछे संभवतः एक कारण यह हो सकता है कि प्रेमी आश्वस्त होना चाहते हैं कि जो वे अनुभव कर रहे हैं किसी स्त्री के साथ, वह क्या है- महज आकर्षण है ? वासना है ? मोह है ? आसक्ति है ? प्रेम है ? क्या है ? कैसे मैं समझूँ कि मुझे प्यार हो गया। अगर ऐसा भाव उठे तो इसे मन की जल्पना समझ कर ज्यादा तरजीह न दें। सिर्फ प्रेम में डूबें। प्रेम जब प्रथम प्रथम जगता है तो वह आकर्षण ही होता है, मोह या आसक्ति से गुजरते हुए अगर सही ढंग से आदमी यात्रा करे, तो उसका प्रेम निर्मल हो सकता है। अपने प्रेम को जाँचने के लिए प्रेम की परिभाषा जानना जरूरी नहीं है। सिर्फ एक कसौटी मैं दे रहा हूँ। अगर आपका प्यार दुख ले आये तो समझिये गलत है, अगर उत्तरोत्तर आनंद में बढ़ोतरी होती जाय तो सही है। हर कर्म की कसौटी आनंद ही है।
प्रेम की परिभाषा जानने से प्रेम नहीं निकलता, परन्तु प्रेम जानने से परिभाषा जरूर निकलती है। आप प्रेम शुरू करें। आपका प्रेम ही परिभाषा को जन्म दे देगा। दूसरों के द्वारा दी गयी प्रेम की परिभाषा के चक्कर में न पड़ें।


Wednesday, September 14, 2011

भ्रष्टाचार समाप्ति के तीन उपाय




भ्रष्टाचार जिन कारणों से पैदा होता है, उनका निवारण कर समस्या का निराकरण किया जा सकता है। देखा गया है कि भ्रष्टाचार के पीछे दो मूलभूत कारण हैं-  नीड और ग्रीड ( जरूरत और लोभ )। कुछ लोग मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति इस दोषपूर्ण व्यवस्था में नहीं कर पाते हैं, इसलिए वे विवश होकर भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं। अतः पहले प्रकार के भष्टाचार को दूर करने के लिए जरूरी है कि जीवन की तमाम भौतिक जरूरतों की पूर्ति सुगमता से हो सके। इसके लिए दो काम करने होंगे। पहला, देश की आबादी घटा दीजिए और दूसरा, उत्पादन को जरूरत से ज्यादा बढ़ा दीजिए। जब जरूरत से ज्यादा उत्पादन और उसका सम्यक् वितरण होगा तो आवश्यकता आधारित भ्रष्टाचार स्वयंमेव खत्म हो जाएँगे। लेकिन, विगत 64 वर्षों में स्वतंत्र भारत के राजनेता ये दो काम करने में विफल रहे हैं। इसका कारण क्या है ? कारण यह है कि हमारी अवैज्ञानिक चुनाव प्रणाली दृढ़ इच्छाशक्ति वाले ईमानदार जनसेवकों को संसद और विधानमंडलों तक पहुँचने से रोकती है। यह चुनाव प्रणाली धनबलियों, बाहुबलियों और सत्ताधारियों के लिए तो प्रशस्त राजमार्ग है, लेकिन साधनहीनों और ईमानदारों के लिए अत्यंत संकीर्ण गली। चुनाव में पूँजीपति पार्टी एवं उनके नेताओं को चंदा के रूप में मोटी रकम देते हैं, जिसे जीतने पर वसूलते हैं। इस तरह पूँजीपतियों और राजनेताओं के बीच सांठ-गांठ हो जाती है और ये दोनों एक-दूसरे के हित में काम करते हैं। नेता जनता को भुलावे में रखकर और उसकी गरीबी एवं अज्ञानता का पोषण कर उससे रैली वगैरह का काम लिया करते हंै। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था बदलने के लिए चुनाव प्रणाली में सुधार नहीं, आमूल परिवर्तन की नितांत आवश्यकता है।
देशवासियों को एक ऐसी चुनाव प्रणाली की कल्पना करनी होगी जो नगण्य खर्च में संपन्न हो, जिसमें 95 से 100 प्रतिशत मतदाताओं की सुगमता से भागीदारी हो, जिसमें पुनर्वापसी की सरलतम व्यवस्था हो और जिसमें धनबल, बाहुबल और सत्ताबल निष्प्रभावी कर दिये जायँ। उस मौलिक कल्पना को समाज के बीच रखा जाय और प्रयोग के द्वारा उसे सिद्ध करके दिखाया जाय ताकि जनता का ध्यान उस ओर आकृष्ट हो। विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि मैंने इस तरह की प्रणाली की कल्पना की है और साधन उपलब्ध होते ही इस पर प्रयोग किया जाएगा।
भ्रष्टाचार का दूसरा सबसे बड़ा कारण है मनुष्य का असीम लोभ या उसकी दुष्पूर महत्वाकांक्षा। लोभ पर विजय पाने के लिए शिक्षा प्रणाली को जड़ से बदलकर उसके केन्द्र में प्रेम को लाना होगा। अभी शिक्षा के केन्द्र में अहंकार है। अहंकार आदमी को आदमी से तोड़ता है, जबकि प्रेम जोड़ता है। अहंकार कहता है मैं बड़ा, प्रेम कहता है तुम बड़े। अहंकार अपने सुख के लिए दूसरों का उपयोग करता है, प्रेम का सारा सुख दूसरों के लिए जीने में है। जब दूसरा, दूसरा न रह जाए अपना हो जाए तो वही है प्रेम। जब प्रेम पराकाष्ठा पर चला जाता है तो दूसरा अपने प्राणों से भी अधिक प्यारा हो जाता है। अपने प्राण का बलिदान कर भी आदमी अपने प्रिय को बचा लेना चाहता है। जब मनुष्य प्रेम की इस मनोदशा में आएगा तो क्या स्वप्न में भी उससे भ्रष्टाचार होगा ?
वर्तमान शिक्षा प्रेम की दुश्मन है। कैसे ? क्योंकि इसके केन्द्र में भीषण प्रतियोगिता है। हम बचपन से ही बच्चों को सिखाते हैं कि कक्षा में प्रथम आओ, दूसरों को पछाड़ कर आगे निकल जाओ। पड़ोस के बच्चों का उदाहरण देते हुए उन्हें सिखावन देते हैं कि देखो, चिक्कू कितना तेज है, कितना बुद्धिमान और तुम कितने बुद्धू हो ! इस तरह उसके भीतर हीनता और ईष्र्या की ज्वाला पैदा करते हैं। दूसरों से आगे निकलने की होड़ में वह तनावग्रस्त हो जाता है। दूसरा उन्हें दुश्मन दिखने लगता है और यह ज्वरग्रस्त दौड़ विश्वविद्यालय से होते हुए नौकरी पाने तक चलती है। इतने लंबे समय के अभ्यास से प्रतिस्पद्र्धा उनकी रगों में दौड़ने लगती है। मनुष्य हर क्षेत्र में दूसरों से आगे निकल जाना चाहता है और इसके लिए हर तरह के भ्रष्टाचार का दामन थाम लेता है।
कहा जाता है कि आगे बढ़ने के लिए और विकास में गति लाने के लिए प्रतियोगिता जरूरी है। लेकिन दीर्घकालीन अभ्यास के कारण ऐसा लगता है। वास्तव में ऐसा है नहीं। फिर भी जो व्यक्ति महसूस करते हैं कि प्रतियोगिता के बिना वे आगे नहीं बढ़ पायेंगे, उन्हें अपने आप से प्रतियोगिता सिखायी जानी चाहिए। यानी आज हमने
ेजहाँ तक विकास किया है, कल उससे आगे निकलना है। कल हम अपने को ही पीछे छोड़ देंगे।
वास्तव में किसी भी विषय में गति पाने का मूलाधार है उस विषय से प्रेम। किसी विषय के प्रेम में डूबकर अनायास आदमी उतना सीख लेता है, जितना प्रतिस्पद्र्धा में कभी नहीं सीख सकता। प्रतिस्पद्र्धा बेचैनी पैदा करती है, जिससे हमारी ऊर्जा नष्ट होती है। प्रेम शांति पैदा करता है, जिससे हमारी ऊर्जा बचती है और सृजन में लगती है। सृजन बहुत बड़ा सुख है। प्रेमाधारित शिक्षा में परस्पर एक-दूसरे की सहायता करते हुए हम आगे बढ़ते हैं। साथ-साथ विकास करने से हमारा आनंद बढ़ता है। लेकिन जो शिक्षा किसी को सता कर, पीछे धकेलकर, किसी को ऊँचे सिंहासन पर स्थापित करती है, वह वास्तव में उसे ज्वालामुखी पर्वत पर ही बैठाती है जहाँ किसी भी समय विस्फोट हो सकता है। शिक्षा में प्रतियोगिता का जहर इतना फैला हुआ है कि साहित्य, संगीत एवं अन्य कलाएँ भी सौन्दर्यबोध और प्रेम पैदा करने में असमर्थ हो गयी हंै !
प्रेम स्वतःस्फूर्त होता है। सिखा पढ़ा कर किसी के भीतर प्रेम पैदा नहीं किया जा सकता। सही शिक्षा के द्वारा सिर्फ प्रेम पैदा होने की परिस्थिति पैदा की जा सकती है। प्रेम उत्पन्न होने के दो मुख्य स्रोत हैं- सेक्स और ध्यान। सेक्स मनुष्य को प्रकृति का अनुपम उपहार है, जबकि ध्यान साधनागत है। सेक्स उस मनोरम जंगल की तरह है जिसके ऊपर हरियाली है और नीचे सांप-बिच्छू हैं। सेक्स से प्रेम भी उत्पन्न हो सकता है तथा हिंसा और द्वेष भी। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो युवाओं को सेक्स की सभी संभावनाओं से अवगत कराए और उसके अनुभवात्मक ज्ञान के द्वारा उत्पन्न प्रेम का पोषण करे। युवाओं के आरंभिक सेक्सुअल लव के प्रति अगर स्वस्थ दृष्टि अपनायी जाय और उसे सही ढंग से विकसित किया जाए तो वह मनुष्य और जीवमात्र के प्रेम में बदल सकता है।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिसका अनिवार्य अंग योग और ध्यान हो। अगर प्रेम अपने आप उत्पन्न नहीं हुआ तो ध्यान के द्वारा उसे उत्पन्न किया जा सकता है। ध्यान अपनी गहराई में अहं को विसर्जित कर देता है और उससे जो आनंद की शिखा जलती है उसका प्रकाश ही प्रेम है। प्रेम आनंद से पैदा होता है और उस आनंद को समाज में फैलाता है। केवल दुखी व्यक्ति भ्रष्टाचार के द्वारा सुख पाना चाहता है।
यह शिक्षा टॉपर को सम्मानित करती है और शेष में हीनता पैदा करती है। हीनता ग्रंथि से उबरने के लिए शेष लोग उच्चता गं्रथि से ग्रसित हो जाते हैं और हर तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं। ध्यान और प्रेम हीनता का हरण करता है और उच्चता ग्रंथि को पनपने नहीं देता।
लोभ का मतलब क्या होता है ? जो दूसरों के पास है, वह मुझे खींच रहा है और जो संपदा मेरे पास है, वह दिखाई नहीं दे रही। मेरे पास अपार धन होना चाहिए; लंबी, चमकदार एसी कार होनी चाहिए, आलीशान मकान होना चाहिए, ऊँचे से ऊँचा पद होना चाहिए, प्रतिष्ठा होनी चाहिए, नाम होना चाहिए। हर हालत में मुझे कुछ न कुछ होना ही चाहिए। मजे की बात यह है कि यह सब हो जाने पर भी आदमी शांत और आनंदित नहीं हो पाता, क्योंकि उसके आगे हमेशा कोई न कोई लक्ष्य होता है जिसको पाने के लिए वह पागल की तरह दौड़ता रहता है। सुंदर, सुसज्जित डाइनिंग हॉल में बेहतरीन वॉल टेलीविजन लगा है, लेकिन देखने की फुरसत नहीं है। करोड़ों की शानदार कार है, पर पिकनिक पर जाने का समय नहीं। सुंदर बिस्तर है, पर नींद नहीं। घर में चुनकर लायी गयी खूबसूरत पत्नी है, पर उसके सौन्दर्य और प्यार में डूबने का वक्त नहीं। वह और की दौड़ में पड़ा हुआ है और जीवन पीछे छूट गया है ! सोचता हूँ कि मनुष्य इतना विक्षिप्त क्यों हो गया है ? तो इसकी जड़ें शिक्षा में मिलती हैं जो अहंकार और महत्वाकांक्षा की बुनियाद पर खड़ी है।
प्रकृति ने प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे से भिन्न बनाया है। सबके भीतर किसी न किसी प्रकार की खासियत है। सबके भीतर कुछ संभावनाएँ हैं। अगर शिक्षा उनके भीतर छिपे हुए बीज को पहचाने और उसे अंकुरित करने की सुविधायें जुटा सके और एक-एक व्यक्ति की आत्मा को जगा सके तो जो आत्मतृप्ति उपलब्ध होगी वह अतुलनीय होगी। ऐसा चेतनशील व्यक्ति कभी जड़ वस्तुओं में सुख की खोज नहीं करेगा और न उसके लिए भ्रष्टाचार करेगा। मनुष्य का सुख इस बात में नहीं है कि उसके पास कितनी चीजें हैं। मनुष्य का सुख इस बात में है कि जो भी उसके पास है उसका उपयोग वह कैसे करता है। हमारे पास कुछ न भी हो तो भी दो आँखें तो हैं जिनमें सौन्दर्य भरकर इस सृष्टि को निहार सकते हैं और उसके प्रेम में डूब सकते हैं। जो चाँद, तारों, पहाड़ों, झरनों, जंंगलों, नदियों के सौन्दर्य से अभिभूत होने से वंचित है, उससे अधिक अभागा कौन होगा ? हमारे पास हाथ-पांव हैं जिनसे हम अपनी जीविका चला सकते हैं। अन्ना के पास तो कोई भौतिक संपदा नहीं है, लेकिन उनके दिल में जनता के प्रति प्यार है तो क्या नहीं है ! वही प्यार उनके चेहरे को हमेशा खिलाये रखता है। वह प्रेम की ऊर्जा ही है जो प्रतिदान के रूप में दूसरों से लौट कर उन तक आ जाती है और उन्हें दीर्घ अनशन की घड़ी में भी स्वस्थ, प्रसन्न बनाये रखती है।
इसलिए अगर भ्रष्टाचार को पूर्णतः समाप्त करना हो तो शिक्षा के इस ढाँचे को तोड़कर प्रेम केन्द्रित शिक्षा लानी होगी। अगर अंशतः दूर करना हो तो केवल चुनाव प्रणाली में आमूल परिवर्तन करना होगा और तात्कालिक राहत पानी हो तो जन लोकपाल विधेयक को कानून का रूप देना होगा। भ्रष्टाचार दूर करने के ये तीन उपाय हैं। तीनों की जरूरत है। जब किसी बीमारी के कारण शरीर का बुखार 106 डिग्री फारेनहाइट हो जाय तो सबसे पहले बुखार को तुरत नीचे उतारना होता है। जन लोकपाल विधेयक उस बुखार को उतारने वाली दवा है। रोग है व्यवस्था में और मन में। चुनाव प्रणाली में आमूल परिवर्तन से परिस्थिति बदली जा सकती है और शिक्षा में आमूल परिवर्तन से मनःस्थिति। मन के रूपांतरण का अर्थ है कि ईष्र्या और घृणा प्रेम में बदल जाय, लोभ आत्मतोष में और क्रोध करुणा में। खुशी की बात है कि अभी तक अन्ना का प्रयास क्रमबद्ध ढंग से सही दिशा में, सही तरीके से चल रहा है।

मटुक नाथ

Thursday, September 08, 2011

एक महिला की मेहरबानी




एक महिला ने मुझे फेसबुक के माध्यम से सलाह भेजी है और उस पर गौर करने को कहा है। उस स्त्री का नाम है प्रिया हल्दोनी, पति का नाम संदीप हल्दोनी। रहती हैं नयी दिल्ली में। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। सम्प्रति दिल्ली स्थित ‘नेशनल इन्स्टीच्यूट आॅफ पैथोलॉजी एंड बायोमेडिकल रिसर्च’ में शोध कर रही हैं। अपने बारे में इतनी जानकारी उन्होंने फेसबुक पर दी है।
मैं स्त्री-पुरुष दोनों को प्यार करता हूँ। लेकिन जैविक कारणों से स्त्रियाँ हठात् आकर्षित कर लेती हैं। इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं कर पाता हूँ। मैं प्रिया की बातों पर अवश्य गौर करूँगा- गहराई तक उतरने का प्रयास करूँगा। उनकी बातों का अर्थ क्या है, कहाँ से पैदा होती हंै ऐसी बातें, क्यों पैदा होती हैं, सही बात क्या हो सकती है, इन सब पर विचार करूँगा। पहले देख लेते हैं कि उनकी सलाह क्या है-
‘‘आपने अपनी एक्स वाइफ का साथ छोड़ा एक ऐसी उमर में जब उन्हें आपकी बहुत जरूरत थी, क्योंकि अभी तक उन्होंने ही आपका साथ दिया था, तो आपको भी उसके साथ रहना चाहिए। यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे, तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का। इसलिए इस पर गौर करें। प्यार सब कुछ नहीं होता, कुछ रिश्ते हमें समाज में रहने के लिए निभाने पड़ते हैं। आपका ये कर्म समाज को गलत मैसेज देता है। हो सके तो इसे समझने का प्रयास करें।’’
प्रिया की सबसे बड़ी चिंता है कि मैंने जो किया, उससे समाज को गलत संदेश मिल रहा है। ‘यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का।’ दरअसल यह अकेले प्रिया हल्दोनी की चिंता नहीं है, भारतवर्ष के लाखों-करोड़ों स्त्री-पुरुषों की चिंता है। इसलिए मामला गंभीरता से विचार करने योग्य है।
एक बात स्पष्ट है कि मैंने जो किया है उससे समाज आंदोलित हुआ है। यह अच्छी बात है, क्योंकि आंदोलन से जड़ता टूटती है। लोग चली आ रही मान्यताओं पर नये सिरे से विचार करते हैं।
मेरे कर्म का प्रभाव एक ही जैसा हर जगह नहीं है। अलग-अलग आदमियों पर अलग-अलग प्रभाव है। व्यक्ति भेद से प्रभाव बदल जाता है। तीन-चार साल पहले की बात है। एक दिन मैंने टीवी खोला तो अचानक देखा कि कवि सम्मेलन चल रहा है और एक कवि मेरे ही ऊपर कविता पढ़ रहा है। कविता में उपमानों की झड़ी थी। मुझे सिर्फ एकाध बात ही याद है। कवि महोदय मंच पर आते हैं। कहते हैं- आपलोगों ने टीवी पर एक प्रेमी जोड़ा देखा होगा। और शुरू हो जाते हैं- ‘जैसे कौवे की चोंच में जलेबी’, इत्यादि।
पूरी कविता कवि की लोलुप दृष्टि को दर्शाती है। कवि को लगता है, हाय रे, मैं कितना हतभाग्य। जलेबी तो मेरी चोंच में होनी चाहिए, कौवे की चोंच में कैसे चली गयी ? अशोभनीय ! निंदनीय !! मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली ईष्र्या बहुत ही दमदार भाव है; क्योंकि जरा सा अवसर मिलते ही क्षण मात्र में भड़क जाती है। अगर हम अपने नैतिक मूल्यों पर विचार करें तो पता चलेगा कि उनमें से बहुतों के केन्द्र में ईष्र्या है। जो नैतिकता ईष्र्या के पेट से पैदा होगी, वह न जाने मनुष्य को किस गड्ढे में धकेल देगी !
जुलाई, 2006 में मुझे एक पोस्टकार्ड मिला, जिसमें मेरे और जूली के प्रेम पर दो पंक्तियाँ लिखी थीं-
‘‘पहलु-ए-हूर में लंगूर, खुदा की कुदरत
कौआ के चोंच में अंगूर, खुदा की कुदरत’’
कौवा मुझे बहुत सुंदर पक्षी मालूम पड़ता है, पता नहीं क्यों कविगण कौवों पर इतने खफा रहते हैं ! लंगूर की भी अपनी खूबसूरती होती है, लेकिन केवल हूर पर ही लुब्ध रहने वाले शायर लंगूर के सौन्दर्य से वंचित हो जाते हैं। इसके लिए थोड़ा गहरा सौन्दर्य बोध चाहिए। बहरहाल, कवि ने अपना नाम ‘एक तिड़कमी शायर, फारबिसगंज’ बताकर असली नाम छिपा लिया है। भय के कारण आदमी अपना नाम छिपाता है। वह भय समाज का हो या जिसको लिखा है उसका हो, या पाप बोध का हो, भय किसी का भी हो, इतना स्पष्ट है कि ऐसा लिखते हुए कवि काँप रहा है ! क्या भयभीत व्यक्ति समाज को रास्ता दिखा सकता है ? इस पत्र में भी शायर की ईष्र्या ही मुखर है।
ईष्र्या दो प्रकार की होती है- एक , जो दूसरे को मिला है, वह उसे न मिलकर मुझे मिल जाय। दो, मुझे नहीं मिला तो किसी को न मिले। दूसरी ईष्र्या ज्यादा विनाशकारी है।
इस तरह मेरे कर्म से अनेक प्रकार के लोग अनेक तरह से आंदोलित हुए। किसी की सोयी रसिकता अचानक  जाग गयी! किसी का आया बुढ़ापा भाग गया! किसी को अपने को श्रेष्ठ साबित करने का मौका मिला ! कोई दूसरे को नीचा दिखाने में रस लेने लगा ! किसी का मन मसखरी के लिए मचल उठा ! किसी को उपदेश देने का स्वर्णिम सुयोग मिल गया ! कुछ शिक्षक मन ही मन उत्साहित हो गए ! कुछ शिक्षक स्वयं के बेनकाब होने के भय से अत्यधिक क्षुब्ध और क्रुद्ध हो गए ! कोई पत्नी अपने पति से सशंकित रहने लगी ! कोई पति पत्नी से सावधान हो गया! कहीं  पति पत्नी दोनों प्रसन्न हो गये! एक पति ने मेरे प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा- झेला आपने, फायदा हुआ मुझे। मैंने पूछा- कैसे ? बोले- अब पत्नी पहले से ज्यादा प्रेम देने लगी है ! इस तरह अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ हुईं।  प्रतिक्रियाओं के असंख्य रूपों में एक खास रूप श्रीमती प्रिया हल्दोनी का है। यहाँ वही विचारणीय विषय है।
प्रियाजी समाज पर मेरे गलत प्रभाव पड़ने की आशंका से परेशान हंै। प्रभाव एक प्राकृतिक क्रिया व्यापार है। हर आदमी दूसरे को प्रभावित कर रहा है और स्वयं उससे प्रभावित हो रहा है। इससे तो बचा नहीं जा सकता। प्रिया भी मुझसे प्रभावित हैं और मैं भी उनसे प्रभावित हूँ। यह प्रभावित होने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह कौन सा प्रभाव लेता है और कौन सा छोड़ देता है। गलत या मूच्र्छित आदमी अच्छे कर्म से भी गलत प्रभाव ले लेता है और अच्छा एवं सजग आदमी गलत काम से भी कुछ अच्छा निकाल लेता है। इसलिए प्रभावित करने वाले को न पकड़कर प्रभावित होने वाले आदमी को पकड़ना चाहिए। वर्षा की बूँदें समुद्र में गिरती हंै तो समुद्र हो जाती हंै, गंगा में गंगा और नाले में नाले का गंदा पानी ! एक दिन मैंने गंदे नाले के पानी को शोर मचाते सुना- ‘वर्षा बंद करो, वर्षा बंद करो। उसके जल ने मुझे गंदा कर दिया है !’ लोग नाले के इस शोर शराबे पर हँसकर कहने लगे- अरे गंदा पानी, वर्षा की बूँदें गंदी नहीं हैं, तुम गंदे हो। तुम्हीं ने अपनी गंदगी मिलाकर उस स्वच्छ जल को गंदा कर दिया है। मेरा भी मन कहता है कि प्रियाजी से पूछूँ- क्या आपने भी प्रेम की निर्मल बूँदों को गंदा नहीं कर दिया है ? प्रिया लिखती हैं- ‘‘प्यार सब कुछ नहीं होता, कुछ रिश्ते हमें समाज में रहने के लिए निभाने पड़ते हैं।’’ अगर आपने प्यार को गंदा न किया होता तो ऐसा कभी नहीं कहतीं। प्यार की पावनता का आपको पता होता तो आप कहतीं- ‘प्यार ही सबकुछ होता है और इसी से समाज के सारे रिश्ते ढंग से निभते हैं।’ पति अथवा पत्नी तिजोरी में बंद कर रखने वाली वस्तु नहीं होते प्रियाजी। जिस कुएँ का पानी नहीं निकाला जाता है, वह सड़ जाता है। तालाब का पानी गंदा हो जाता है, लेकिन बहता पानी निर्मला। पति पत्नी के संबंध पर पहरेदारी मत कीजिए। ईष्र्या और एकाधिकार से संबंध जहरीला हो जाता है। पति को अगर गुलाम बनाइयेगा तो प्रेम खो जायेगा, पत्नी पर कोई सवार रहेगा तो प्रेम मिट जायेगा। हमारे समाज में तो प्रेम की भू्रण हत्या होती है, पैदा होने से पहले ही उसे मार दिया जाता है। मरा हुआ प्रेम ढोने को ही आप निभाना कहती हैं- जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को ढोती रहती है ! बहुत मुश्किल है ईष्र्या और अधिकार भावना से बाहर होना। यह तपश्चर्या है। इस तपस्या के बिना समाज प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता।
मटुक का मतलब है घोर अभाव और कठिनाइयों में भी आनंदित रहने की क्षमता ! मटुक का मतलब है प्रेम के लिए संसार की सारी प्रेम विरोधी शक्तियों से एक साथ टकराने का अदम्य साहस। उनसे लड़ते लड़ते वीरगति पाने की उत्कट लालसा। मटुक का मतलब है अंदर और बाहर की एकता। मटुक का मतलब है सबके प्रति सद्भाव। मटुक का मतलब एक ऐसे समाज का निर्माण है जिसके केन्द्र में प्रेम हो। जहाँ प्रेम होगा, वहाँ शोषण नहीं हो सकता। जहाँ शोषण नहीं होगा वहाँ धन इकट्ठा करने वाला कुबेर न होगा। जहाँ कुबेर न होगा, वहाँ कोई चोर भी न होगा, न भ्रष्टाचार होगा। मटुक का मतलब है एक ऐसी विचारधारा जिसमें अपनत्व हो, मैत्री हो, प्रेम हो, कोई किसी का मालिक न हो। व्यक्ति स्वयं अपना मालिक हो। मटुक का मतलब है स्त्री पुरुष के सहज नैसर्गिक प्रेम की स्वीकृति और उसके फलने फूलने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता। गलत संदेश मेरी तरफ से नहीं जा रहा है। समाज पहले से ही गलत संदेश से ग्रसित है, क्योंकि प्यार से उसे डर लगता है और उससे परहेज करता है। मैं तो तपस्यारत हूँ। मुझसे अगर कोई संदेश निकलेगा तो तप का ही निकलेगा। लेकिन आप तप करने को राजी नहीं हैं। आप पति या पत्नी पर मिलकियत छोड़ने को तैयार नहीं हैं। संदेश न लेना आपकी स्वतंत्रता है। जैसे जीना चाहते हैं, वैसे जीयें। लेकिन गलत जीवन जीने वाला दुख पाता है और अपने दुख की जिम्मेदारी दूसरों को देकर उन्हें भी परेशान करना चाहता है। उन्हें तरह तरह से सलाह देता है और कभी दुश्मन मानकर आक्रमण कर बैठता है।
प्रियाजी लिखती हैं- ‘‘ आपने अपनी एक्स वाइफ का साथ छोड़ा एक ऐसी उमर में जब उन्हें आपकी बहुत जरूरत थी, क्योंकि अभी तक उन्होंने ही आपका साथ दिया था तो आपको भी उनके साथ रहना चाहिए।’’
क्या आप मेरी पत्नी से मिलीं ? मुझसे मिलीं ? मेरे जीवन और पत्नी के जीवन को अंदर बाहर से जाना ? हम दोनों के संबंधों को निकट से देखा, समझा ? जाहिर है, आपने ये सब नहीं किया। फिर भी कितने आत्मविश्वास के साथ आप उपर्युक्त वचन कह गयीं ! अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘फरिश्ते जहाँ पाँव रखने में घबड़ाते हैं, मूर्ख वहाँ सरपट दौड़ लगाते हैं !’ आप सरपट दौड़ लगा गयीं ! पता लगाने का विषय है कि मैंने पत्नी को छोड़ा या पत्नी ने मुझे छोड़ा ! पत्नी को मेरी जरूरत थी या किसी और चीज की जरूरत थी ! पत्नी को मैंने सताया या पत्नी ने मुझे ! मेरी संपत्ति पत्नी ने हड़पी या मैंने उसे उससे वंचित किया ! सचाई का पता वह लगाता है जो खोजी वृत्ति का होता है, जिज्ञासु होता है। हमारी शिक्षा ने जिज्ञासा को नष्ट कर दिया है। उसने किसी चीज पर संदेह कर श्रमपूर्वक उसे दूर करने की विद्या नहीं सिखायी- उसने अंधविश्वास सिखा दिया ! इसी खोजी वृत्ति के अभाव में हमारे देश में विज्ञान नहीं पनपा। कहने के लिए तो आप एक रिसर्चर हैं, लेकिन अनुसंधान की वृत्ति आप में होती तो आप बिना पता लगाये वह नहीं लिख जातीं, जो लिख गयीं !
  आप तो जिस भाषा का प्रयोग कर रही हैं उसका भी अर्थ नहीं समझ रही हैं, तो दूर स्थित मटुक का अर्थ कहाँ से समझेंगी ? एक्स वाइफ का माने होता है वह स्त्री जो अब वाइफ नहीं हैं, पहले कभी थी। जो छोड़ी जा चुकी है, जो अतीत हो चुकी है। एक्स वाइफ ( छोड़ी हुए वाइफ ) को छोड़ने का क्या अर्थ होता है ? आप कृपया जान लीजिए- मेरी पत्नी मेरे लिए सदा वर्तमान है, वह भूतपूर्व नहीं है। वह सदा सुहागन है ! न मैंने उसे तलाक दिया है और न दूसरी शादी की है। मेरे मन में उसके लिए जगह है। साथ ही यह भी कह दूँ कि मेरा प्रेम पाने के अधिकारी वे सभी व्यक्ति हैं जो ईष्र्या रहित हैं। ऐसे ही लोगों पर मैं अपने को लुटाता हूँ। आपने मेरी पत्नी को भूतपूर्व बनाने का अपराध किया है। अगर मेरी पत्नी को यह मालूम होगा, तो वह आपका मुँह नोच लेगी !
लोग सिर्फ मेरी पत्नी को ढाल बनाकर उसकी आड़ में अपनी ही व्यथा कहते हैं। आपने भी संभवतः यही किया है। पुरुष की वृत्ति स्वभावतः चलायमान होती है। आपके पति भी संभवतः अपवाद नहीं होंगे। उनकी हरकतों को देखकर भीतर से आपकी आत्मा डाँवाडोल हो गयी होगी ! घबड़ाहट में आप अपने और अपने पति के भीतर नहीं झाँककर हजार किलोमीटर की दूरी पर बैठे मटुक को दोषी ठहरा रही हैं! आपका दाम्पत्य जीवन चाहे जैसा भी हो, उसके लिए जिम्मेदार आप ही दोनों हैं। मैं कैसे हो सकता हूँ ? मान न मान मैं तेरा मेहमान ! मुझे आप मेहमान मत बनाइये। मुझे आपने दिल के किसी कोने में जगह दे दी होगी, इसी से सब उपद्रव हो रहा है। आप एकनिष्ठ होकर अपने पति में चित्त को रमाइये। जब आप पति प्रेम में रसमग्न होंगी तो मेरा प्रभाव वहाँ तक नहीं पहुँचेगा। मेरा प्रभाव उन्हीं पर पड़ता है जिन्होंने अपने दिलों में मुझे जगहें दे रखी हैं।
आप लिखती हैं-‘ यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे, तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का ?’
मुझे तो अब तक मेरे जैसा एक भी आदमी पूरे देश में नहीं दिखा, आपको कहाँ दिख गया ? जाहिर है, आपको भी नहीं दिख रहा है, आप केवल कल्पना कर रही हैं कि अगर ऐसा होगा तो क्या होगा। आपको वर्तमान की जरा भी फिक्र नहीं है, भविष्य की कल्पना से त्रस्त हैं ! यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है।  वर्तमान में स्थित होकर जीेयें, कभी कोई समस्या नहीं होगी।
आश्चर्य तो मुझे इस बात से हो रहा है कि आपने प्रसंग उठाया पत्नी का और चिंता करने लगीं मां-बहनों की ! मेरी पत्नी भाग्यशालिनी माँ है। उसका बेटा बहुत योग्य, मेधावी, कलाकार और मातृभक्त है। विदेश जाना अभी तक मेरे लिए सपना बना हुआ है ! लेकिन मेरे बेटे ने अपनी माँ को दुनिया के कुछ हिस्सों की सैर करा दी है। भारत के महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों का दर्शन हवाई जहाज द्वारा करा दिया है। मेरी पत्नी हर तरह से सशक्त अपने डॉक्टर भाई की दुलारी और प्यारी बहन है। वह ऐसे सामथ्र्यवान भाई की बहन है जो अपनी बहन की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता है- यहाँ तक कि अपनी नाक भी कटा सकता है! भगवान करे आपको भी ऐसा पुत्र और भाई मिले।
आप पत्नियों की तरफदारी करने चलीं थीं, लेकिन किसी हीन गं्रथि के कारण मां-बहन की तरफदारी करने लग गयीं ! अपने वाक्यार्थ के प्रति भी आप बेखबर हैं, तो मेरी खबर कैसे रखेंगी ? आपको लिखना चाहिए था कि यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा इस देश की पत्नियों का ? मैं कहता हूँ, कुछ नहीं होगा; क्योंकि एक तो सभी लोग ऐसा नहीं करेंगे। दूसरे, जो थोड़े से लोग करेंगे, उनकी पत्नियों को कोई चिंता करने की बात नहीं है, क्योंकि पुरुषों को दूसरों की पत्नियाँ, चाहे जैसी भी हों, सदा आकृष्ट करती हैं। स्त्री अगर स्वयं सदा के लिए किसी पुरुष की गुलाम बनी रहने पर अड़ी रहे तो कोई पुरुष उसे मुक्ति नहीं दिला पायेगा। अगर पत्नियों को अपने भीतर आकर्षण पैदा करना है तो जरा सा अपने पति को भी ढील दे दें और स्वयं भी ढील ले लें।
जड़ वैवाहिक संबंध ने मनुष्य को पशु से भी नीचे कर दिया है। विवाह के द्वारा मनुष्य चला था पशु से अच्छा बनने के लिए और उससे भी बदतर जगह पर पहुँच गया! एक जानवर भी स्वतंत्रतापूर्वक यौन संबंध स्थापित कर सकता है, लेकिन मनुष्य इसके लिए तरस रहा है ! मनुष्य ने अपने हाथों से अपने पाँव में जंजीरें लगा ली हैं। इस बंधन की ऐसी भीषण प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य बलात्कारी हो गया ! आप गौर करेंगी कि पशु बलात्कार नहीं करता। मनुष्य सेक्स का क्रेता और विक्रेता हो गया ! वह सेक्स का व्यापार करने लगा ! जो हवा और पानी की तरह मुफ्त में सुलभ था, उसी की वह खरीद बिक्री करने लगा ! पशु ऐसा नहीं करता। मनुष्य अप्राकृतिक यौन संबंध का शिकार हो गया, पशु ऐसा नहीं होता। सेक्स के लिए न जाने मनुष्य कितने तरह से धोखे का जाल रचता है ! दहेज इस विवाह प्रथा का ही विषफल है, जिसके कारण न जाने कितनी स्त्रियाँ प्रतिदिन अपने प्राणों को गँवा रही हैं। पशुओं में कोई ऐसी प्रथा नहीं है। रास्ता यह था कि मनुष्य सेक्स को पशु की तरह सहज रूप में स्वीकार करता और धीरे-धीेरे उसे रूपांतरित कर ब्रह्मचर्य के आनंदलोक में प्रवेश करता। लेकिन इसे न समझ कर उसने दमित और जबरिया ब्रह्मचर्य को अपनाने की कोशिश की और रुग्ण हो गया !  इस रुग्णता से निकलने का रास्ता तो है हल्दोनी जी। लेकिन खोजने वाला चित्त कहाँ हैं ?
जिंदगी भर मनुष्य एक ही स्त्री या पुरुष से बँधा रहे, दूसरे से प्रेम न हो, यह मुझे अस्वाभाविक मालूम पड़ता है। हाँ, जो एक के साथ रहने में स्वाभाविक रूप से आनंदित हो और अन्य की चाहना न करे तो उसके लिए वह बिल्कुल ठीक है, वह उसी तरह रहे। लेकिन मन को मारकर एक को लेकर ही रहे, यह गलत है। और जो उस एक से ही निभाते रहने का फरमान जारी करे, वह दोगुना गलत है। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसी सलाह वही देते हैं जो खुद अपने मन को मारकर जी रहे होते हैं। अधिकांश लोगों के सोचने का ढंग गलत है। हम सबको एक ही टाइप का आदमी बनाना चाहते हैं। सबको एक ही टाइप में ढालना चाहते हैं, जबकि हर व्यक्ति का व्यक्तित्व अलग अलग होता है, उसकी जीवन शैली अलग होती है। हर व्यक्ति अपने ढंग से जीने में ही सुख शांति का अनुभव कर सकता है। जिस दिन मशीन टाइप के लोग मशीनीकरण से बाहर होकर अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को प्राप्त करेंगे उसी दिन जिंदगी से मुलाकात कर पायेंगे। प्रिया हल्दोनी टाइप के लोगों ने जीना सीखा कहाँ है और जब तक आदमी अपने जीवन को नहीं पा लेता तब तक वह अंदर से एक अभाव और बेचैनी महसूस करता है। इसी दुख और बेचैनी में वह किसी अन्य पुरुष से जा टकराता है-
आँख से छलका आँसू और जा टपका शराब में
मुझे लगता है कि इस सृष्टि में जड़ता और चेतनता के बीच निरंतर संघर्ष चल रहा है; दोनों के अपने गुरुत्वाकर्षण हैं। जड़ता अपनी तरफ खींचना चाहती है और चेतनता अपनी तरफ। जड़ता जड़ता की तरफ आकृष्ट हो जाती है और चेतनता चेतनता से जा मिलती है। जिसकी चेतना के सारे दरवाजे बंद हैं वे हल्दोनी के विचारों में कैद रहेंगे। जिनकी चेतना थोड़ी सी जगी है वे उससे निकल कर बाहर की हवा में साँस लेंगे। जड़ता दुख है, चेतनता आनंद है। मनुष्य की यही स्वतंत्रता है कि वह जिसे चाहे उसे चुन ले।

मटुक नाथ
  8.09.11

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